Poems written by Veerendra Shivhare (Veer)

Veerendra Shivhare (Veer)

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Engineer. Entrepreneur. Poet.'वीर' (वीरेंद्र शिवहरे) - अपने बारे में कुछ लिखना यक़ीनन एक मुश्किल शय है | फिर भी एक कोशिश लाज़मी है | बचपन जबलपुर (संस्कारधानी) में गुज़रा.. कॉलेज की पढाई झीलों के शहर भोपाल में | स्कूल के दिनों में ही जगजीत सिंह की गाई हुई गज़लों का शौक़ था | और फिर धीरे-धीरे लफ़्ज़ों से नाता जुड निकला | उर्दू न कहीं सीखी न हिंदी के विदवान बने.. बस जज्बातों ने सब सिखा दिया |Buy my poetry book 'Veeransh' @ Buy a copy of Veeransh - Notion Press | Amazon.in | FlipKart | Infibeam
Profile photo of Veerendra Shivhare (Veer)

About Veerendra Shivhare (Veer)

Veerendra Shivhare weaves simple yet profound thoughts into captivating Urdu/Hindustani poetry. His soul-stirring verses give a glimpse of an intense yearning that each one of us is familiar with. Being a serial entrepreneur, ghazal aficionado, spiritual seeker and urdu poetry lover, ‘existence- in it’s purest form' Veer's undeterred muse and meaning. Veeransh is his first book of poems. Veer lives in Bangalore.

एक आईना जो बोलता है

एक आईना जो बोलता है kavita

घर के एक कोने में बैठा, निगाहों में वही तीर लिए, यार जो यारी तोलता है, एक आईना जो बोलता है| हर दिन मैं बदल गया, हर हाल में वो ढल गया, वो खुदा की तरह बुलंद है, न हँसता

कोई धार तो मुझे बहा ले!

कोई धार तो मुझे बहा ले! geet

कोई धार तो मुझे बहा ले, कब तक बैठूं नदी किनारे| ऊब गया हूँ देख-देख कर, बहता पानी, रुके किनारे| विचारों का प्रवाह निरंतर, मैं की खोज में भटकता अंतर| या इस कंकड़ को जल बना ले, या इस कंकड़

कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह

कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह ghazal

हर दिन अपने लिए एक जाल बुनता हूँ, कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ| हर रोज़ इम्तिहान लेती है ज़िंदगी, हर रोज़ मगर मैं मोहब्बत चुनता हूँ| कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हू… बहुत

रोज़ देखता हूँ!

रोज़ देखता हूँ! ghazal

सियासत का वहशी नंगा नाच.. रोज़ देखता हूँ, हाथों में पत्थर, पैरों में कांच.. रोज़ देखता हूँ| कभी इसके सर तो कभी उसके सर टांग दिया, हर नए दिन का नया सरताज.. रोज़ देखता हूँ| हाथों में पत्थर, पैरों में

बदल डालो!

बदल डालो! ghazal

सिर्फ़ पन्ना ही क्यों, पूरी किताब बदल डालो, बासे हुए हैं जो ख़्वाब, वो ख़्वाब बदल डालो ज़िंदगी के पास न जाने कितने ही सुरूर हैं, जब ज़ायका ज़ुबां चढ़े, शराब बदल डालो ये नादानियाँ तुम भी कर लो सांस रहते,

इस शहर की दुकानों में

इस शहर की दुकानों में ghazal

इस शहर की दुकानों में मुझे बेच रहा है हुनर मेरा, मैं खरीद रहा हूँ अपने रास्ते और नीलाम हो रहा है सफ़र मेरा| एक शख्स मेरे अन्दर मुझे जीस्त की मजबूरियां गिनाता है, मैं ढल रहा हूँ बदलते सांचों

इंतिज़ाम

इंतिज़ाम ghazal

मयखानों में शराबों का इंतिज़ाम कीजिये, हम पढ़ने आये हैं, आँखों का इंतिज़ाम कीजिये| मुझे ढूंढ रहा है मेरा माज़ी गलियों गलियों, ए मेरी हसरत ओ तमन्ना, ठिकानों का इंतिज़ाम कीजिये| हम पढ़ने आये हैं, आँखों का इंतिज़ाम कीजिये… ये

तराशा हुआ पत्थर हूँ

तराशा हुआ पत्थर हूँ ghazal

तराशा हुआ पत्थर हूँ, अब बस टूटना बाकी है, पुर्ज़े तो मेरे कर चुके हो, अब बस लूटना बाकी है| हर शख्स इमारत ए सब्र के आखिरी छोर पर है, उम्मीद हार चुका है, अब बस कूदना बाकी है| तराशा

मैं न कोई मसीहा न कोई रहनुमा हूँ

मैं न कोई मसीहा न कोई रहनुमा हूँ ghazal

मैं न कोई मसीहा, न कोई रहनुमा हूँ, मैं अपनी आग हूँ, मैं अपना ही धुंआ हूँ। मुझे परखने वाले शायद ये नहीं जानते, मैं अपना गुनाह हूँ, मैं अपनी ही सज़ा हूँ। हर बार नाकाम हुई है साजिश दुनिया

कुछ डरा हुआ सा दिल

कुछ डरा हुआ सा दिल ghazal

कुछ डरा हुआ सा दिल, थोड़ा परेशान है, अब ये मौसम चंद दिनों का मेहमान है। कुछ ज़माने को भी हैं हमसे ग़लतफ़हमियाँ, कुछ हमें भी अपनी शख्सियत का गुमान है। तिनके सा बह निकला हूँ दरिया के साथ, जो

तुम और मैं

तुम और मैं ghazal

राह-ए-उल्फत में अपना ठिकाना न आया, मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया| साज़-ए-जिंदिगी ने सुर ऐसा छेड़ा, मुझे गाना न आया, तुम्हें गुनगुनाना न आया| मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया… बच्चों की तरह गिले भी

सादगी गुमा दी

सादगी गुमा दी ghazal

सादगी गुमा दी माँ मैंने, ज़िंदगी उलझा ली माँ मैंने| मिली ना सुकूं की बूंद तो, आँख अपनी भिगा ली माँ मैंने| तू कहती थी हौंसला रख हमेशा, देख उम्मीद की लौ बुझा दी माँ मैंने| बनाता था कभी काग़ज़

सावन मेरे

सावन मेरे geet

लौटे नहीं हैं परदेस से साजन मेरे, तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे| अब आए हो तो दर पर ही रुकना, पाँव ना रखना तुम आँगन मेरे| तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे… तेरी ये गड़गड़ाहट,

मैं ख़तावार हूँ

मैं ख़तावार हूँ ghazal

मैं ख़तावार हूँ, माफ़ी की गुज़ारिश न करूँगा, तू बड़ा दिलवाला है, तेरी आज़माईश न करूँगा। अपने समंदर में ख़ामोश ही डूब जाऊँगा, अपनी क़ज़ा की लेकिन मैं नुमाईश न करूँगा। गहरे ज़ख्मों से दिल अभी सहमा सहमा है, कहता

दिल बहुत ज़लील हुआ

दिल बहुत ज़लील हुआ ghazal

लम्हा मोहब्बत से अना में तब्दील हुआ, उसे दुनिया से मांग कर.. दिल बहुत ज़लील हुआ| तेरी बेरुखी मंज़ूर हो चली थी हमें, तेरा सच कहना रिश्ते की आखरी कील हुआ| उसे दुनिया से मांग कर दिल बहुत ज़लील हुआ…

कसूर ये है

कसूर ये है ghazal

कसूर ये है के तू हर वक़्त मयस्सर है, जिन्हें देखनी है दुनिया उनका तू घर है आना और जाना फ़ितरत-ओ-मजबूरी है, कहीं को न जाता हुआ, ये कैसा सफ़र है तुम से ज़्यादा अज़ीज़ मंज़िल कभी न थी, बात

अच्छा लगता है…

अच्छा लगता है... ghazal

तुम से दिल की हर बात कहना अच्छा लगता है, इस बेगानी दुनिया में तू मुझे अपना लगता है| तुझ संग गुज़र रही है बहुत आराम से ज़िंदगी, तुझ बिन फूलों से भरा रास्ता खुर्दरा लगता है| तुम से दिल

सीखो

सीखो ghazal

बहुत भाग लिये, अब रुकना सीखो, अदब सीखो, अदब से झुकना सीखो। रास्ते खुदबखुद बन जायेंगे चलते चलते, तुम गिरना सीखो गिरकर उठना सीखो। सुखनवरी भी आ जायेगी धीरे धीरे, पहले तुम ईमानदारी से लिखना सीखो। बाज़ार ए उल्फ़त ने

कुछ ख़्वाब

कुछ ख़्वाब ghazal

कुछ ख़्वाब न देखें तो गुज़ारा नहीं होता, जो हमारा है हक़ीकत में.. हमारा नहीं होता| गर उसकी नज़र से मेरी नज़र मिल जाए, दुनिया में इससे खूबसूरत नज़ारा नहीं होता| कुछ ख़्वाब न देखें तो गुज़ारा नहीं होता… तुम

ज़रूरतों की चक्की

ज़रूरतों की चक्की ghazal

कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में, खुद को पीछे छोड़ आये.. अपनों की तरक्की में| मुद्दत का थका हुआ था, तो आँख लग गयी, सारा मंज़र ही बदल गया.. एक झपकी में| कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में…

आँखें खोल कर देख!

आँखें खोल कर देख! kavita

ज़हन से ख़याल झाड़ कर देख, डर की आँख में झाँक कर देख| ज़िंदगी से खुद को मांग कर देख, अपने वजूद को पहचान कर देख| लम्हे को कभी बाँध कर देख, वक़्त के दरिया को थाम कर देख| हदों

इजाज़त

इजाज़त ghazal

जिसकी इजाज़त दिल न दे वो काम मत कीजिये, इन हाथों से अपना खेल तमाम मत कीजिये| बेसबब नहीं होता कुछ भी यहाँ, खुद से गद्दारी का ये काम मत कीजिये| जिसकी इजाज़त दिल न दे वो काम मत कीजिये|

एक-एक रुपया मेरी जेब का

एक एक रुपया मेरी जेब का ghazal

न खैरात में मिला है, न वसीयत काम आई है, एक-एक रुपया मेरी जेब का, गाढ़े पसीने की कमाई है| न शागिर्दी है मिजाज़ में, न बेपनाह हुनर है कोई, मैंने ठोकरें खा-खा कर, अपनी रह बनाई है| एक-एक रुपया

इल्ज़ाम तूफ़ानों पर आता रहा

इल्ज़ाम तूफ़ानों पर आता रहा ghazal

मैं दिल का ग़ुबार उड़ाता रहा, इल्ज़ाम तूफ़ानों पर आता रहा| मैं छोड़ आया वो शहर ए वफ़ा, वो गली.. वो मोहल्ला बुलाता रहा| इल्ज़ाम तूफ़ानों पर आता रहा… मुद्दत हो गयी उसको टूटे हुए, वो ख़्वाब मगर.. जगाता रहा|

ज़िंदगी रूठी हुई

ज़िंदगी रूठी हुई ghazal

है लम्हें का अरमान मुझसे लिपट जाने का, देख रही है उसे हसरत से.. ज़िंदगी रूठी हुई| मैं अपने ख़्वाब जग ज़ाहिर नहीं करता, ये सलतनत है मेरी सभी से लूटी हुई| देख रही है उसे हसरत से ज़िंदगी रूठी

मगर कोई कमी है

मगर कोई कमी है ghazal

मैं तुझे अपनी आँखों में भर तो लूँ ज़रा, न जाने क्यों वक़्त को, गुज़रने की हड़बड़ी है| गुज़र जायेगा मगर.. फिर से आएगा ज़रूर, ये जीवन दुःख और सुख की कड़ी दर कड़ी है| न जाने क्यों वक़्त को,

हर शख्स के हाथ में कटोरा है!

हर शख्स के हाथ में कटोरा है! ghazal

हर शख्स के हाथ में कटोरा है, जिसके पास जितना है.. थोड़ा है| साँस – साँस मुजरिम बनी है, मेरी हर साँस ने मुझे तोड़ा है| हर शख्स के हाथ में कटोरा है… हसरत ए ख़ुशी में भागता है वहशी,

चंद लम्हों को

चंद लम्हों को ghazal

चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं, बनाने वाले ग़मों को भी, खुशियाँ बना लेते हैं| न पंख बचे और अब न हौंसला उड़ने का, शाम होते ही, हम काग़ज़ पर तितलियाँ बना लेते हैं| चंद लम्हों को कई

अँगार ढूँढता हूँ

अँगार ढूँढता हूँ ghazal

कैसा कर्ज़दार हूँ के सूद लिए साहुकार ढूँढता हूँ, जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अँगार ढूँढता हूँ| न शहर बचा, न घर और न घर में रहने वाले, तन्हाई की धूप में सिर छुपाने को दीवार ढूँढता

हासिल के दायरे

हासिल के दायरे ghazal

तेरे नाम को हम कब रोते हैं, हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं| ना रख कोई ख़लिश दिल में, ख्व़ाब आखिर ख्व़ाब ही होते हैं| हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं… यही तो दस्तूर है ज़माने का, मिलकर दिल अक्सर