Poems written by sowvik

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sowvik

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ये आँखें ही हैं ये जो ख्वाब दिखाए जिनमे बैठे हैं छुपाये वो सारे राज़ जो किसी से न कहें जो किसी से न सुने कहें तो सिर्फ खुद से बोले ये राज़ सारे आँखों में ही रहें
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sab phool ko uske girte dekha thahar phool ka chehra phir se khilta haiusi naam se bas humien pukar lohar phool mien ab gulmohur ka chehra milta hai

लकीरें

लकीरें azad nazm

लकीरें रंग बदलती हैं कभी वो राहें नहीं मिलेंगी रोज़ मुझे ज़ुबान पे कुछ और दिल से कुछ न कहो मैं राहों पे चलते ही तुम्हें ढूँढ लूँगा आओ..हम इस पार मिलें जहाँ पे दो लकीरों को बदलते देखा था

इस घर का नाम न था

इस घर का नाम न था kavita

इस ऐड्रेस पर शायद अब कोई नहीं मिलता इस ऐड्रेस पर अब शायद कोई भी नहीं रहता है क्या इस घर का ठिकाना बदल गया हैं या इसके लोग? इस घर से थोड़ी सी ही दूरी के वक़्त पर रुका