Poems written by Soliloquy...

कुछ बीत गया कुछ बाकी है

कुछ बीत गया कुछ बाकी है kavita

वो एक सुबह जब अलसाई सी मैं आँखों को मलती थी वो शाम एक जिसके ढलते ही नींद आँख में चढ़ती थी जब एक गोद में दुनिया थी और मुट्ठी में सारा अधिकार वो नवजात शिशु का राजा मन, कुछ

मैं

मैं kavita

मैं स्वच्छंद अविरल नदी की धारा न रुक पाऊँगी तीरों पे मैं पक्षी हूँ उन्मुक्त गगन की न बाँध मुझे ज़ंजीरों से मैं नहीं हूँ सीता जो जलूँ अग्नि संग न द्रौपदी हूँ जो चीर लुटा दे मैं गंगा नहीं

भीगी यादें

भीगी यादें kavita

कल शाम एक थी भीगी सी था धुआं धुआं सा आँखों में मैं सपने बुनने बैठी थी और फिसल गिरी कुछ यादों में कुछ यादें भुनते भुट्टों की कुछ गरम चाय के प्यालों की कुछ यादें नम लिबासों की कुछ

क्या हूँ मैं?

क्या हूँ मैं? kavita

क्या हूँ मैं? इंसान हूँ, या फ़कत तेरी ज़रुरत का एक सामान हूँ मैं? क्या समझूँ ये बता? पहचान हूँ, या तेरे अहम् की तृप्ति का तरीका आसान हूँ मैं? क्या लगता है तुझको? नादान हूँ, या बेसमझ तेरे ऊपर