Poems written by SK Agrawal

विदाई गीत

विदाई गीत kavita

किरणों की डोली सजी, सूरज चंदा बने कहार, छोड़ चाँदनी आज पिया घर, चली पिया के द्वार, माली ने एक चमन लगाया, फल फूलों से उसे सजाया कली खिली जब फूल बनी, कर कमलों में उसे थमाया कर कमलों का

मुखौटा

मुखौटा kavita

सबके मुख पर चढ़ा मुखौटा असली रूप छिपाए रे, मन ही मन में देत गारियाँ ऊपर से मुस्काए रे, दिल के अंदर खोट छिपा है, झूठा प्यार जताए रे, राह दिखाए अपना बन के पग पग कांटे बिछवाए रे, अपना

ये जनता को क्या देंगे

ये जनता को क्या देंगे vyang

भूमि सम्पदा के मालिक चेलों चमचों से घिरे हुए, आडम्बर करने वाले सिंहासन आरूढ़ गाड़ियों में चलने वाले, धन दौलत के मालिक छत्र चँवर धारण करने वाले, ये धर्म गुरू ये मठाधीश ये क्या राह दिखायेंगे, बहका कर फुसलाकर जनता

क्यों जाती तू इधर उधर

क्यों जाती तू इधर उधर kavita

मैं खड़ा किनारे देख रहा मझधार किधर है भंवर किधर, क्यों लहरें जाती इधर उधर क्यों फिर टकराती लहर लहर, यह क्रोध है या विक्षोभ किसी का जो उतरा है तट के ऊपर, क्षण इधर गई क्षण उधर गई क्षण

ऐसा तो नहीं कहा था

ऐसा तो नहीं कहा था geet

भरी सभा में एक द़ौपदी कोई त्रस्त हुई थी, कवच बने थे कृष्ण, लाज की रक्षा तुरंत हुई थी, आज हज़ारों द़ौपदियों की इज्ज़त दाव लगी है, नग्न देह चौराहों पर सिमटी कांप रही हैं, अट्टहास करता दुःशासन दुर्योधन हुंकार

कैसा निष्ठुर युग आया है

कैसा निष्ठुर युग आया है kavita

कैसा निष्ठुर युग आया है कैसे निर्मम लोग यहाँ, कैसे कलुषित कर्म हो रहे बिना किसी अवरोध यहाँ, कभी कभी जो कल होती थी नित्य आज वो होती हैं, लाखों प्यारी मासूम बेटियाँ ससुराल में पीड़ित होती हैं, चाहे कोई

बिक रहीं हैं बेटियाँ

बिक रहीं हैं बेटियाँ kavita

भगवान अपने इस जहां में, क्या क्या दिखाने जा रहा है भगवान तेरे इस जहां में, सब कुछ बिकने जा रहा है क्यों ज़िन्दगी इतनी सस्ती, रो रही है हर इक बस्ती क्यों बेचकर ईमान मानव, जीवन जुटाने जा रहा

ये अश्रु बड़े कीमत वाले

ये अश्रु बड़े कीमत वाले kavita

इनको ऐसे मत बिखराओ ये अश्रु बड़े कीमत वाले, किस निष्ठुर ने छलकाए नैन तेरे मतवाले, गिरें सीप तो मोती बनते गिरें फूल तो शबनम, गर प्रेमी के ऊपर बरसें आग लगाएँ तन मन, मिले पवन तो उठें घटाएँ सावन