Poems written by SHIVESH SHIVKUMAR

हों विसंगतियाँ कितनी

हों विसंगतियाँ कितनी kavita

ऋतुओं के थपेड़े सर्दियों की सिहरन सिहर जायेगी हमारे रिश्ते की रूहानी गर्माहट निखर जायेगी क्या हुआ रहने को बसर नहीं दिल हमारे तो घर हैं इक दूजे को संभाले बसेरे की ललक बिसर जायेगी अश्क आँखों मेँ झलके बताते