Poems written by Sanjiv

चल रहे

चल रहे ghazal

चल रहे पर अचल हम हैं गीत भी हैं, ग़ज़ल हम हैं आप चाहें कहें मुक्तक नकल हम हैं, असल हम हैं हैं सनातन, चिर पुरातन सत्य कहते नवल हम हैं कभी हैं बंजर अहिल्या कभी बढ़ती फ़सल हम हैं

धरती की छाती फटी

धरती की छाती फटी geet

धरती की छाती फटी फैला हाहाकार पर्वत, घाटी या मैदान सभी जगह मानव हैरान क्रंदन-रुदन न रुकता है जागा क्या कोई शैतान? विधना हमसे क्यों रूठा? क्या करुणा सागर झूठा? किया भरोसा क्या नाहक पल भर में ऐसे टूटा? डसते

मन के अंदर

मन के अंदर geet

मन के अंदर कितने मन हैं? कुछ दुर्जन हैं कुछ सज्जन हैं मन के अंदर अनगिन मन हैं मन में हैं संकल्प अनगिनत शंकाएँ-संदेह अनगिनत अनुसंधान-विकल्प अनगिनत नाम-काम निष्काम अनगिनत भोर दुपहरी शाम अनगिनत श्रम-कोशिश-परिणाम अनगिनत साधन-साध्य अगेह जतन है

अभियंता

अभियंता kavita

अभियंता निज सृष्टि रच, धारण करें तटस्थता भोग करें सब अनवरत, कैसी है भवितव्यता, मुँह न मोड़ते फ़र्ज़ से, करें कर्म की साधना जगत देखता है नहीं अभियंता की भावना, सूर सदृश शासन मुआ, करता अनदेखी सतत अभियंता योगी सदृश,

ग़ैर कहोगे जिनको

ग़ैर कहोगे जिनको geet

ग़ैर कहोगे जिनको वे ही मित्र सगे होंगे न माँगेंगे पानी-राशन न चाहेंगे प्यार नहीं लगायेंगे वे तुमको अनचाहे फटकार शिकवे-गिले-शिकायत तुमसे? होंगे कभी नहीं न ही जतायेंगे वे तुम पर कभी तनिक अधिकार काम पड़े पर नहीं आचरण प्रेम-पगे

बात कर

बात कर ghazal

निर्जीव को संजीव बनाने की बात कर हारे हुओं को जंग जिताने की बात कर ‘भू माफ़िये’! भूचाल कहे, ‘मत ज़मीं दबा जो जोड़ ली है उसको लुटाने की बात कर’ ‘आँखें मिलायें’ मौत से कहती है ज़िंदगी आ मारने

अंतर में अंतर

अंतर में अंतर doha

अंतर में अंतर पले, तब कैसे हो स्नेह अंतर से अंतर मिटे, तब हो देह विदेह अंतर = मन / भेद देख रहे छिप-छिप कली, मन में जागी प्रीत देख छिपकली वितृष्णा, क्यों हो छू भयभीत? छिप कली = आड़

हाज़िर हो

हाज़िर हो geet

समय न्यायधीश की लगती अदालत, गीत! हाज़िर हो, लगा है इल्ज़ाम तुम पर गिरगिटों सा बदलते हो रंग, श्रुति-ऋचा या अनुष्टुप बन छेड़ दी थी सरसता की जंग, रूप धरकर मन्त्र का या श्लोक का शून्य करते भंग, काल की

आप से आप ही

आप से आप ही ghazal

आप से आप ही टकरा रहा है आप ही आप जी घबरा रहा है धूप ने छाँव से कर दी बगावत चाँद से सूर्य क्यों घबरा रहा है? क्यों फ़ना हो रहा विश्वास कहिए? दुपहरी में अँधेरा छा रहा है

पशुपतिनाथ! तुम्हारे रहते

पशुपतिनाथ! तुम्हारे रहते geet

पशुपतिनाथ! तुम्हारे रहते जनगण हुआ अनाथ? वसुधा मैया भईं कुपित डोल गईं चट्टानें किसमें बूता धरती कब काँपेगी अनुमाने? देख-देख भूडोल चकित क्यों? सीखें रहना साथ, अनसमझा भूकम्प न हो अब मानवता का काल पृथ्वी पर भूचाल, हुए, हो रहे,

हम एक हों

हम एक हों geet

हम एक हों, हम नेक हों, बल दो हमें जगदंबिके नित प्रात हो हम साथ हों नत माथ हो जगवन्दिते, नित भोर भारत-भारती वर दें हमें सब हों सुखी असहाय के प्रति हों सहायक हो न कोई भी दुखी| मत

अपनों पर

अपनों पर geet

अपनों पर अपनों की तिरछी रहीं निगाहें, साये से भय खाते लोग दूर न होता शक का रोग बलिदानी को युग भूले अवसरवादी करता भोग सत्य न सुन सह पाते झूठी होती वाहें अपनों पर अपनों की तिरछी रहीं निगाहें,

बाँस बना ताज़ा अखबार

बाँस बना ताज़ा अखबार geet

अलस्सुबह बाँस बना ताज़ा अखबार, फाँसी लगा किसान ने ख़बर बनाई खूब, पत्रकार नेता गए चर्चाओं में डूब, जानेवाला गया है उनको तनिक न रंज क्षुद्र स्वार्थ हित कर रहे जो औरों पर तंज़, ले किसान से सेठ को दे

अपनी बात

अपनी बात geet

पल दो पल का दर्द यहाँ है पल दो पल की खुशियाँ हैं आभासी जीवन जीते हम नकली सारी दुनिया है जिसने सच को जान लिया वह ढाई आखर पढ़ता है खाता पीता सोता है जग हाथ अंत में मलता

बोलना था जब

बोलना था जब ghazal

बोलना था जब, तभी लब कुछ नहीं बोले बोलना था जब नहीं, बेबात भी बोले काग जैसे बोलते हरदम रहे नेता ग़म यही कोयल सरीखे क्यों नहीं बोले? परदेस की ध्वजा रहे फ़हरा अगर नादां निज देश का झंडा उठा

चूक जाओ न

चूक जाओ न ghazal

चूक जाओ न, जीत जाने से कुछ न पाओगे दिल दुखाने से काश! ख़ामोश हो गये होते रार बढ़ती रही बढ़ाने से बावफ़ा थे, न बेवफ़ा होते बात बनती है, मिल बनाने से घर की घर में रहे तो बेहतर