Poems written by Sanjeev Kumar Sharma

Sanjeev Kumar Sharma

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ना नींद में हूँ, ना जागता हूँ, कभी संपनो के पीछे, कभी सपनो से भागता हूँlमैं अपने ख्वाबों की दुनियां के रंगीन लम्हों को कुछ अल्फाजों में या फिर रंगों के घोल में समेटने की कोशिश करता हूँ I

एक भारत

एक भारत kavita

एक भारत एक भारत कभी ये ख़्वाहिश कभी हक़ीकत हिमालय से हिन्द तक काज़ीरंगा से गिर तक सुनहरा इतिहास भी आज़ाद जीने का एहसास भी मिली है हमको ये विरासत एक भारत एक भारत कभी ये ख़्वाहिश कभी हक़ीकत ऊँची

मैं तुम्हारा साया हूँ !!

मैं तुम्हारा साया हूँ !! kavita

मेरी पहचान तुम्हीं से है मेरी जान तुम्हीं से है, मेरी उत्पत्ति तुम्हीं से है और मैं तुम्हीं में समाया हूँ मैं तुम्हारा साया हूँ मैं तुम्हारा साया हूँ, ये लोगों का भ्रम है कि सूरज के उठते ही मैं

लम्हों के कुछ क़तरे

लम्हों के कुछ क़तरे kavita

ज़िन्दगी को परत दर परत खोला बीते सालों को, महीनों को टटोला, उन्हें अच्छे से निचोड़ कर लम्हों के क़तरे निकाले ऐसे कई छोटे-मोटे लम्हे फ़र्श पर उड़ेल डाले, टकटकी लगाये, हर एक लम्हे पर नज़र गड़ाए हर एक को

वक़्त से गुज़ारिश

वक़्त से गुज़ारिश kavita

ऐ वक़्त तुम हो किधर? कई दिनों से तुम दिखे नहीं तुम तेज़ भाग रहे हो या मैं धीमे चल रहा हूँ शायद मैं ही धीमे चल रहा हूँ राह में ख़्वाब मिले, अरमान मिले, आसना भी मिले पर तुझे

हौसला

हौसला kavita

तमन्ना तो मुझे भी थी ऊँची उड़ानों की ता उम्र बस हौसला जुटाता रहा, समंदर की रेत से टीला बनाने की जब ठानी ता उम्र बस घरौंदे बनाता रहा, मिटाता रहा, रंगरेज़ बन इन्द्रधनुष से चला रंगने सब को ता

कुछ लोगों को कुछ उम्मीदें हैं

कुछ लोगों को कुछ उम्मीदें हैं kavita

ख़ुदा ने दिए हैं जिस्म-ओ-जान बेशर्त मुझे मैं उस एहसान को चुकाने के लिए जिए जाता हूँ, कुछ लोगों को कुछ उम्मीदें हैं मुझसे मैं उन रिश्तों को निभाने के लिए जिए जाता हूँ, अभी भी कई चराग़ हैं बुझे