Poems written by rubina_thind

यूँ ही चल दिए हैं अजनबी…

यूँ ही चल दिए हैं अजनबी... kavita

यूँ ही चल दिए हैं अजनबी राहों की ओर कहीं तो मंज़िल होगी कहीं तो ठिकाना होगा, आरज़ू-ए-दिल तो बंजारों की तरह चलता रहा अब अपने शौंक की खातिर मुझको भटक जाना होगा, बहुत दूर तक चला जाता है मेरी