Poems written by Richa Chauhan

चाहत

चाहत kavita

हर फ़िक्र की फ़िक्र छोड़ तेरे साथ उड़ जाना चाहती हूँ हर सोच को भुलाकर कुछ पग तेरे साथ चलना चाहती हूँ कहीं पहुँचने की हसरत नहीं बस सफ़र को जीना चाहती हूँ तेरे साथ साथ उड़कर एक अनदेखा सपना

ठिठोला मन

ठिठोला मन kavita

न जाने क्या चाहे ये ठिठोला मन कभी चाहे इतना शोर हो कानों में मेरे कि खुद की आवाज़ भी न सुन पाऊँ इतनी भीड़ हो पास मेरे कि खुद के अक्स से भी न रूबरू हो पाऊँ इतनी गति

समुन्दर की कहानी

समुन्दर की कहानी kavita

ये जो सामने है मेरे मुझे मेरा अक्स दिखता है इसमें, दूर दूर तक कोई दूसरा किनारा नहीं और बहुत कुछ समेटा है जिसने, इसकी साँसें इसकी लहरें हैं उथल पुथल जिनमें है मची कहने को तो बहुत कुछ है

एक समन्दर मेरे भीतर

एक समन्दर मेरे भीतर kavita

माना तू विशाल सही पर एक समन्दर तो मेरे भीतर भी बहता है कभी निर्मल ओस की बूँद की भांति कभी चट्टान सा जटिल दिखता है कभी चकोर सा शीतल कभी आग सा धधकता है कभी पुष्प सा सुगंधित कभी

खुशी की पहचान

खुशी की पहचान kavita

एक रोज़ कहूँगी कि मैं अपना अक्स जानती हूँ हाँ मैं भी अपनी हर खुशी को पहचानती हूँ एक पंछी सी आसमान में उड़ सकूँ पंख फैला मदहोश चलती पवन से मिल सकूँ एक छोटा सा मेरा भी घोसला हो

कवि नहीं मैं

कवि नहीं मैं kavita

हूँ कवि नहीं मैं, न मुझे काव्य रस का बहुत ज्ञान है मैं तो एक अज्ञानी हूँ, अपने व्यक्तित्व पर न मुझे अभिमान है लिखना मेरा व्यापार नहीं मैं तो बस कभी कलम उठा लेता हूँ जो बात खुद से

कुछ तो है

कुछ तो है kavita

कुछ तो है ऐसा जो मुझे खटक रहा है फाँस बनके जो सुई सा चुभ रहा है क्यूँ हर बात पर आँखें नम हैं क्यूँ ज़िंदगी के रंग थोड़े कम हैं क्यूँ हर कोई मानो थोड़ा-थोड़ा उदास है रूठा ज़िंदगी