Poems written by Rahul Khandalkar

Rahul Khandalkar

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I prefer a label on my forehead to blinkers on my eyes.A Journalist, Poet, Author, A Film Industry Personnel, CEO of Confluence India & A National Awardee Scout.Rahul Khandalkar is a Award Winning FilmMaker. He is A Director,Writer,Lyricist,Journalist & A Social Activist. He is also the core team member of many International Film Festivals at India & Abroad MISFF, RISFF & AISFF are one of them..Rahul is a well known Film Maker who makes Short Films & Documentaries. Apart from this he is very active film personnal in Bollywood, Tollywood, Marathi Film Industry & Main Stream Feature Cinema. Dandam (Bollywood Feature) , Thigal (Marathi Feature), Kru, Born To Die are few of his notable pieces..Khandalkar is also a active Journalist,Writer & Social Activist working from the Media Hub of the Country New Delhi. He Works Freelancingly here in this term and writes for various media houses regularly., Dainik Bhaskar, Dainik Jagran, Gaon Connection, Samaj Samvad, Khabrein24, Chaupal, Kalam, Kalyug ki kalam are few of them..He was previously the President of Many Organizations Like Prayas Youth Foundation, Jaagar Foundation & Indian Council for Talent Search & Competitions (ICTSC).

ज्ञानधारा

ज्ञानधारा vyang

खाली काल टपाल पर श्वेतांबर सजा खड़ी-खड़ू की ये कला जाने कितनों के अरमान हैं लाखों महरूम हैं इसके एक दीदार से झोंपड़ी में कुछ पड़े दंगल में हैं कुछ मरे कुछ फुटपाथ पे झुरमुठ खड़े जो इसे है छू

लोग

लोग ghazal

जैसे कूड़े को झाड़ देते हैं लोग दुनिया उजाड़ देते हैं अच्छी खासी मेरे वतन की फ़ज़ा चार पत्थर बिगाड़ देते हैं चीर देते हैं दिल को लोग ऐसे जैसे काग़ज़ को फाड़ देते हैं क़त्ल करते हैं करने वाले

पश्चाताप

पश्चाताप kavita

रोज़ पश्चाताप, वही पुरानी गलती गलती न दोहराने का प्रण और प्रण पूरा न कर पाने का अफ़सोस, यह कहानी न जाने कितनों की “पश्चाताप” पर पश्चाताप कर ‘पश्चाताप’ करने की अनगिनत किस्सों पर आँसू बहाने की और वापिस हर

लेकिन

लेकिन vyang

कितना शोर कितनी आवाज़ें हैं यहाँ, कान होकर भी जो कभी सुनाई नहीं देतीं, अजीब इत्तेफ़ाक़ है या कहो विडम्बना है, जब कभी की खुद को शांत करने की कोशिश मन को, माया को क्रोध को, सभी को बंद करने

कश्मकश

कश्मकश azad nazm

क्या बयां करूँ मंज़र-ए-दास्तान? जब कि पूरी की पूरी महफ़िल फीकी है, भरे पूरे बाज़ार में कई ठेकेदार लेकिन मस्त सरोकार की कमी है, रंगो-शबाब के साये में भी तस्वीर “वह” कोसों दूर है, सपनों की बारात में दूल्हा ही

गुरु

गुरु kavita

गुरु धूप है ज़िन्दगी की एक रौशनी, एक पथदर्शक एक किरण बेअंत सफ़र की, गुरु की कोई परिभाषा नहीं वह अनंत ज्ञान महासागर, राग-अनुराग एक सागर एक अंबर अनंत विराट विशाल, गुरु गुरु ही है विषमता को क्षमता में तब्दील

मुसाफ़िर

मुसाफ़िर kavita

सुन ओ रास्ते से जाते मुसाफ़िर मुझे भी साथ तू ले चल मुसाफ़िर, साथ-साथ तय कर लेंगे ये सफ़र, दो ही पल साथ अपने मुझको ले-ले आज ज़रा, ओ मुसाफ़िर, यादों के कुएँ से निकाल पियेंगे पानी ख़्वाहिशों के पथ

मेरे हिस्से की धूप

मेरे हिस्से की धूप kavita

मैं खुद के हिस्से की धूप मांगता हूँ कुछ और नहीं बस पल दो चार मांगता हूँ खूब जिया अब तलक साये में तेरे अब बस खुद का दीदार करना चाहता हूँ तेरे सपनों, ख़्वाहिशों के बोझ तले ढला मेरे

मेरे अंदर का इंसान

मेरे अंदर का इंसान kavita

उस मासूम की आँखों में भूख देखता हूँ, और उसकी ज़ुबान से निकला- “बूटपोलिश वाला” जब मेरे कानों से टकराता है मेरे अंदर का इंसान थोड़ा सा और मर जाता है, अजीब कशमकश में, खुद को तब मैं पाता हूँ

कलाम

कलाम kavita

आज समय का पहिया घूमा, पीछे सब कुछ छूट गया एक सितारा भारत माता की आँखों का टूट गया, उसकी आँखें बंद हुईं तो पलकें कई निचोड़ गया सदियों तक न भर पायेगा, वो खालीपन छोड़ गया, न मज़हब का

रण

रण kavita

इस रण के हमाम में योद्धा हर हलाल है कैसा ये कमाल है? कैसा ये तूफ़ान है? राम राज – दान राज सब बना हलाल राज हर ओर हराम राज कैसा ये टपाल है? हर खिलौना, हर कड़ी नोट हरी

पुराने निशां

पुराने निशां kavita

कुछ निशां पुराने ज़ख्मों के उभर आये हैं आज फिर से वो ख़्वाब में नज़र आये हैं, मैं बुझ चुका हूँ जलते-जलते इक उम्र से आये तो हैं लौटकर वो देर से मगर आये हैं, कुछ निशां पुराने ज़ख्मों के

दूरियाँ कितनी भी हों

दूरियाँ कितनी भी हों kavita

दूरियाँ चाहे कितनी भी हों दो लफ़्ज़ ज़रूरी हैं मिटाने को यूँ ना समझो के सब कुछ खो गया हमारा देखो ज़माना बाक़ी है जीत जाने को, क्या हुआ के इस पल हार गए पूरा समा बाक़ी है जीत जाने