Poems written by पुष्कर रंजन

मुझे घिन्न आती है !

मुझे घिन्न आती है ! kavita

मुझे घिन्न आती है, घिन्न आती है उन लड़कियों से जिनके चेहरों पर तेज़ाब से हमला हुआ है, कुरूप होती हैं ये लडकियाँ मैं कितने आराम से अपने घर के बिस्तर पर बैठा लिख रहा होता हूँ प्रेम संवाद, और

कुछ मजबूरी ही रही होगी उनकी

कुछ मजबूरी ही रही होगी उनकी kavita

ये जो चंद क्षण हैं जब दिन ढल रहा होता है, और वो, फिर से आने का वादा कर के बिना मुड़े चले जाते हैं अजीब सी खामोशी होती है, दूर, बहुत देर तलक गूंजती है, कहती है – नादान,

बूढ़ा हो गया है धर्म !!

बूढ़ा हो गया है धर्म !! kavita

बूढ़ा हो गया है धर्म !! गौर से देखो, तो दिखेगा कि कितना बूढ़ा हो गया है धर्म, झुर्रियाँ दिखने लगीं हैं, इतना कमज़ोर हो गया है कि ठहाकों की आवाज़ से सहम उठता है, डरा हुआ है इतना कि