Poems written by प्रकाश यादव "निर्भीक"

खफ़ा

खफ़ा kavita

खफ़ा नहीं हूँ मैं तुम्हारी बेवफ़ाई पर खता तो मेरी है कि तुम पे एतबार किया, ऐसा हादसा मेरे साथ पहली दफ़ा तो नहीं जब चाहा जिसने, मुझ पर वार किया। दुआ ही तो मांगी हमेशा उनके लिए जिसने अक्सर

बेबसी

बेबसी kavita

खींच लाती है मुझे, बार-बार अनायास अपने पास, वह अदभुत् शक्ति, जिस से मैं वर्षों पहले अलग हो चुका हूँ, अपनी बेबसी के कारण जाता हूँ जब भी, बर्ष दो बर्ष में पास उनके, लगता है ऐसा मानो सारा सुख

गुलमोहर

गुलमोहर kavita

गुलमोहर तुमने यह लाली कहाँ से है पाई, झुलसती गर्मी में भी कैसे बचा पाई अपनी लालिमा और अपने अस्तित्व को, कह दो न जाकर एक बार ज़रा मेरे गुलमोहर को भी, जिसकी लाली का इंतिज़ार है मुझे, साक्षी भी

अहसास

अहसास kavita

तुम्हारी यादों के गुलाबों को रखा है मैंने सहेज कर, ज्यों का त्यों, नहीं कुम्हलाई हैं उनकी कोई कोमल नाज़ुक पँखुड़ियाँ, नहीं कुरेद रहा हूँ उन्हेँ, बंद हूँ उसकी आगोश में चुपचाप भौंरा जो हूँ मैं तुम्हारे प्यार का, तुम्हारी

अनचाही ज़िन्दगी

अनचाही ज़िन्दगी kavita

वह ज़िन्दगी जो जीना नहीं चाहता, जिसका हरेक क्षण चुभता है मुझे, जिसकी कोई भी अदाएँ मुझे नहीं भाती, फिर भी क्यों है आती वही ज़िन्दगी सन्निकट मेरे, मुझसे करने को प्रीति, सुना था प्रीति होती है आपस में दोनों