Poems written by प्रकाश यादव "निर्भीक"

माँ मैं एक बेटी हूँ

माँ मैं एक बेटी हूँ kavita

माँ, मैं एक बेटी हूँ पैदा होते ही घर में, घर की लक्ष्मी कहलाती हूँ मोम की गुड़िया सी दिखती हूँ नन्हे पाँव में बंधी पायल के रुनझुन स्वर से, घर में मधुर धुन सुनाती हूँ भाइयों की कलाईयों में

बेख़बर कहाँ चले गए

बेख़बर कहाँ चले गए ghazal

हो बेख़बर कहाँ चले गए, अब ख़बर हमारी लेगा कौन है व्यथित अन्तर्मन अपना, अपनी बात सुनेगा कौन चंचल चित विचलित हो बैठा, सुकून का अब ठौर नहीं उत्साहित हो जाऊँ कहाँ अब, स्नेहिल बात करेगा कौन रहकर दूर पहले

सफ़र की डगर

सफ़र की डगर kavita

सफ़र की डगर पर न जाने किधर से, मुलाकात हुई फिर आज उनसे जिनसे हुई थी मुलाकात कभी, चलती बस के सफ़र मेँ देखा था जिनको तब, आशा भरी नज़रों से पुन: मिलने की उम्मीद लिए, दफ़ना दिया था उन

अधूरी ख़्वाहिश

अधूरी ख़्वाहिश kavita

यादों के घने बादल में, छुपे चाँद को देखना ख़्वाबों के महकते चमन में, हर एक फूल को सजाना समन्दर किनारे बैठकर, बलखाती लहरों के साथ बीते सुनहरे पलों को याद करते हुए, मन ही मन मुस्काना कितना सुखद लगता

जीवन के पल

जीवन के पल kavita

धीरे धीरे तू चल रे जीवन के पल कि कोई आता है, है बहुत वो क़रीब जीवन है खुशनसीब मेरे दिल को भाता है, रूठकर न गया कहीं थोड़ी देर ओझल सही फिर वो मुझे बुलाता है, है सामने नहीं

अक्सर ख़यालों में

अक्सर ख़यालों में ghazal

अक्सर ख़यालों में आना आपका अच्छा लगता है कुछ देर ही सही पर साथ आपका अच्छा लगता है वो बातें वो मुलाक़ातें जो रह गईं अधूरी अब तलक ख़्वाबों में ही गुफ़्तगू कर आपसे वो सच्चा लगता है ज़िन्दगी की

अनछूए एहसास

अनछूए एहसास kavita

आज नदिया किनारे पेड़ की छाँव में बैठा नितांत अकेला दुनिया की भीड़ से दूर, खो गया जीवन के सुनहरे अतीत के आँगन में, मंद मंद बहती बयारों के सुकूँ भरे एक मधुर एहसास के बीच, कल कल बहती धारा

व्याकुल मन

व्याकुल मन geet

व्यथित व्याकुल मन आतुर है कबसे मन की वो बात करूँ तो अब किससे दर्शन को अब तो ये नयन भी तरसे चंचल चित तो अब विचलित हो बैठा, ढाढस दे इस दिल को समझाया नहीं है वो अब फिर

इस जहां से जाने वाले

इस जहां से जाने वाले geet

इस जहां से जाने वाले बिन तेरे अब चैन कहाँ, धरती पर मेरे रखवाले बिन आँसू ये नैन कहाँ, दिन बीतता उलझन में नींद भरी अब रैन कहाँ, कैसा हूँ अब कौन हूँ मैं ख़बर को वो बेचैन कहाँ, सब

कंचन सी हमसफ़र

कंचन सी हमसफ़र kavita

आज जीवन के पंद्रह बसंत संग गुज़रे अविरल तुम्हारे साथ, कुछ खट्टे कुछ मीठे अनुभूति लेकर, भर दिए तुमने अनेकों रंग जीवन में अपने विवेक, त्याग, विश्वास और करुणा के, तुम्हारी उन्मुक्त हँसी कम करती रही अक्सर मेरी उदासी को,

एक मासूम प्रश्न

एक मासूम प्रश्न kavita

बड़ी ही मासूमियत से एक प्रश्न पूछा आज छ: वर्षीय अविरल ने क्या पापा मैं भी अलग रहूँगा आपसे जैसे आप अलग हो रहते हो मेरी दादी माँ से सुनते ही ये शब्द स्तब्ध हो गया मैं कुछ क्षण के

माँ

माँ kavita

तेरे आँचल की छाँव में फिर से सो जाने को जी चाहता है, जहाँ दुनिया की सारी झंझावतों से दूर बस तेरे प्यार की वो अद्भुत दुनिया है जिसमें सुकून के सिवा कुछ नहीं मिलता, तेरे हाथ सिर पर पड़ते

आतुर निगाहें

आतुर निगाहें kavita

अब गाँव के सुधन काका नहीं रहे जो मेरे घर पहुँचते ही स्कूल से आ जाया करते थे सारा काम छोड़ कर हाल चाल पूछने बैठ जाया करते थे बाबूजी की बगल में इत्मीनान से चाय की चुस्की लेते हुये