Poems written by Poonam Singh

ख़ुदगर्ज़..!!

ख़ुदगर्ज़..!! vyang

हम कितने बेदर्द हुए जा रहे हैं हम कितने बेरहम हुए जा रहे हैं, टी.वी.पर इज्ज़त लुटने की ख़बर देख थूकते हैं गाली देते हैं उन दरिंदों को, क़त्लेआम की ख़बर सुन कर मातम मनाते हैं कुछ सेकेण्ड ग़मज़दा होते

ये धर्म नहीं होते

ये धर्म नहीं होते kavita

ये धर्म नहीं होते ये धर्म स्थान नहीं होते, तुम और मैं, तुम और मैं नहीं, सिर्फ़ हम ही हम होते हम ही हम होते, ये धर्म के ठेकेदार यूँ हमारे दिलों में, नफ़रत की दीवार ना खड़ी करते, तो

लाचार..!!

लाचार..!! kavita

जन्म जहाँ तुमने पाया प्रहार वहीं पर करते हो, वारिस की खातिर गर्भ में बेटियों को लावारिस करते हो, वही बनेगी बहु किसी की बहन किसी की होगी वो, हे नर, नारी को क्यों इस सृष्टी से बेघर करते हो,

खोया हुआ बचपन…!!

खोया हुआ बचपन...!! kavita

अक्सर उसे दूर से देखा था- पीठ पर एक बोरी लादे कूड़े के ढेर में कुछ तलाशते, हमेशा सोचती, ज़रूर ये बच्ची कूड़े में गल्ती से चली गई, किसी कीमती चीज़ की तलाश में रहती है, जब क़रीब से देखा

चंचल हवा

चंचल हवा kavita

उनके पाँवों का चुम्बन ले के ज़रा, मेरे पास तू आना ऐ चंचल हवा, तुझे सीने से अपने लगा लूंगा मैं, उनके साये को धीरे से छूना ज़रा, जिस्म नाज़ुक है छूते ही छिल जाएगा, उनके दामन से तुम न

मेरी ईर्ष्या

मेरी ईर्ष्या kavita

क्यों हम अपने दुःख से ज़्यादा दूसरों के सुख से दुखी होते हैं क्यों ईर्ष्या की आग में तप कर कुंदन तो नहीं सिर्फ़ कोयला बन सुलगते हैं इतना सुलगे कि अपनी ख़ुशी की चमक भी धुंधली लगने लगी नहीं

बेटी..!!

बेटी..!! kavita

रोज़ रोज़ आने वाले को तो दुनिया वाले भी घर में जगह नहीं देते फिर यमराज क्यों मुझे यमलोक में जगह देगें दरवाज़े पर ही हज़ार सवाल पूछेंगे तुम्हें इतनी लम्बी ज़िन्दगी दी थी इतनी जल्दी वापस कैसे आ गई