Poems written by Nelaksh Shukla

अश्वत्थामा

अश्वत्थामा kavita

कालांतर के झरोखों से पलटे हैं पन्ने स्मृतियों के होता है अनायास ही विस्मरण छूट गए थे जो मील के पत्थर समय की निरंतरता से पीछे आज बने हैं स्तंभ विस्मृतियों के हौले से आकर जो आभास कराते हैं कभी

बादल

बादल kavita

इक बादल था जो गुज़र गया तुम को देखा तो ठहर गया तुम ने जो देखा बरस गया अपनी हद से वह गुज़र गया बूँदें जो तुम से टकराती थीं उस पल ही फ़ना हो जाती थीं नियति की नीयत

मोह

मोह kavita

सारी खुशियों का यह जोड़ है सभी दुखों का यह निचोड़ कभी बनता है ताकत करता कभी कमज़ोर है मोह, भावना के सागर में संवेदना की लहरों सा कभी देता सहारा तो कभी तलाशता सहारा, कभी रिश्तों में जीवंतता के

पीपल का पेड़

पीपल का पेड़ kavita

मैं पीपल का पेड़ संजोए वर्षों का इतिहास बना गवाह खड़ा बेपरवाह मैं पीपल का पेड़, मैंने देखा बुधिया का बचपन धमा चौकड़ी, दूध और मक्खन मैंने देखे अनगिनत बसंत न जाने कितने साधू संत, कितने पत्थर मेरे तले बने शिवालय

गेहूँ और ग़ुलाब

गेहूँ और ग़ुलाब kavita

शिकायत है उन ग़ुलाबों से जो रखते हैं कांटे दिखाने के लिए हमदर्दी की चाशनी पाने के लिए, ओढ़ कर संवेदना की चादर उड़ाते हैं मखौल उन गेहूँ की बालियों का जो तपती धूप में करती हैं इंतिज़ार बारिश की

झिझक

झिझक kavita

तेरे मेरे दरमियाँ ख़ामोश सी यह झिझक, जब भी उमड़ता भावों का समुन्दर छूना चाहते लफ़्ज़ लबों की जुम्बिश को यकायक रोक देती है ख़ामोश सी यह झिझक, वैसे तो मैं बिन्दास हूँ हर सवाल का खुद जवाब हूँ जब

बूँद

बूँद kavita

सिमटी सी कुछ सकुचाई सी ठहर गई वह पत्तों पर, भावों का सैलाब लिए शब्द ठहर जाए अधरों पर, बंधी हुई है मर्यादा में जीवन मगर अपार है, खारे जल का सागर भी न पा सका पार है, खुद में

समुद्र

समुद्र kavita

तू मुझे बहुत रास आया आदि काल से तू हमसाया, जब हुआ था मंथन निकला था हलाहल स्वीकारा एक अवधूत ने वर्षों से पी रहा तू वह गरल, जो है निष्कर्ष खण्डित होती प्रकृति  का असीमित महत्वाकांक्षाओं का तू ही

नि:शब्द

नि:शब्द kavita

मैं नि:शब्द खड़ा मैं स्तब्ध चल रहा है चक्र चक्र काल का हर क्षण बदलते घटनाक्रम के हाल का पतन और उत्थान का तमस का ज्योति की ओर रुझान का मैं अबोध हो रहा है बोध चल रहा है चक्र,

दो प्यारे

दो प्यारे kavita

दो प्यारे आँखों के तारे मेरे राजदुलारे, सारे जग से न्यारे मेरे यह दो प्यारे, जब मैं होता इनसे दूर थक के हो जाता मैं चूर, इनका स्मरण करता मुझ को ऊर्जा से पूरा परिपूर्ण, जैसे नदी निकलती गिर से

राणा प्रताप

राणा प्रताप kavita

कुम्भलगढ़ में जन्म हुआ धरती पर जैसे पर्व हुआ भानु का मानो उदय हुआ, वीरों के इतिहास का एक और अध्याय शुरू हुआ, अमरकोट में अकबर ने उन्हीं दिनों में जन्म लिया इतिहास बनाने राणा संग एक और योद्धा प्रकट

एकलव्य

एकलव्य kavita

घनघोर परिश्रम बनी तपस्या तब आया बाणों का भेद, बना के मूरत अपने गुरु की कर दिया अनार्य ने लक्ष्य को भेद, निष्कंटक वन में एक सुबह जब किया गुरु ने स्वयं प्रवेश, दुस्साहसी श्वान ने यकायक कर दिया द्रोण

ताज महल

ताज महल kavita

शाहजहां नहीं तो क्या गढ़े हैं कई ताजमहल, फूंके हैं प्राण स्याही के किया है जीवंत शुष्क सफ़ेद पन्नों को, की हैं काशीदकारियाँ कलम की उकेरी हैं नक्काशियाँ भावनाओं की, स्याह काली रात के बाद आती है जब चान्दनी रात

शिवाजी

शिवाजी kavita

काल के उस पृष्ठ पे चिन्हित वह जैसे हुआ कांपी धरा पर्वत हिले कुछ आगमन ऐसा हुआ, जल रही थीं रश्मियाँ कुण्ड में कपाल सी ले रहा था सिसकियाँ शील हिन्दुस्तान का शील भंग रोकने कपाल कुण्ड तोड़ने छिन्न भिन्न

बैराग

बैराग kavita

कल कल करता कलपुर्ज़ों का कलुषित सा यह कोलाहल बरस रहा इस भू पटल पर रक्तबीज सा है हलाहल, दौड़ रहा यहाँ हर कोई कुछ पाने की चाहत में अजब विहंगम दृश्य यहाँ है सागर मध्य खड़ा प्यासा है, दुनिया

कर्मयोग

कर्मयोग kavita

जब भी होता विचारों में युद्ध कौरवों के रूप में आ खड़े होते स्वार्थ लोभ और प्रलोभन, बढ़ता अंतर्द्वंद गहराता निराशा का अंधकार, मलिन होती प्रतिबद्धता जो परिणाम थी चीरहरण का खुद के ज़मीर का जागृत हुआ विवेक कसता मन

बोध

बोध kavita

सजा रंगमंच घोर छल प्रपंच, कर्म काण्डों का मायाजाल बना जी का जंजाल, त्रस्त बेहाल होना चाहता उन्मुक्त, पाना चाहता उसे जो है सबसे मुक्त, मुक्ति के लिए करता हर रीति का आलिंगन फिर कैसा यह बंधन, उठने के लिए

कहानी

कहानी kavita

वह अखाड़े की मिट्टी वह बादाम काजू वह दण्ड पेलते रूस्तम और राजू वह सुबह का होना या शाम ढलना दिमाग में हर वक़्त कुश्ती का होना वह गिरना उठना या दाव चलना वह प्यारी सी थपकी या नींद की

निष्प्राण किसान

निष्प्राण किसान kavita

आपसी बंदर बांट में उभरा पार्टियों में मतभेद, रक्त हो रहा सफ़ेद कृतघ्न निजाम का खुल रहा है भेद, माटी जो कभी थी ऊर्जा से लबरेज़ आज पड़ी है निस्तेज, प्रस्फुटित होता जीवन जहाँ होता ऊर्जा का संचार आज बनी

चातक

चातक kavita

देखी है तड़प सदियों से लहरों की साहिल से मिलने को, दूर से दिखती है ललक आसमान की धरती से मिलने को, पथराई आँखों में नज़रों को अब भी तलाश है तुम से मिलने को, गर है तक़दीर तो यह

द्रौपदी

द्रौपदी kavita

हैं खुले केश वह अग्निवेश करने ध्रुपद का पूर्ण उद्देश्य उतरी धरा पर शक्ति शेष चंचल चपला कामिनी सात सुरों की रागिनी पाण्डवों की अर्धांगिनी हुंकार भर रही दामिनी, रचा स्वयंवर मान का द्वन्द हुआ था बाण का आए थे

विश्वास

विश्वास kavita

जब मैं छोटा था मेरा विश्वास बङ़ा था तेरी उंगली पकड़ कर मेरा वर्तमान भविष्य की ओर बढ़ा था, पांव लड़खड़ाते थे पर उंगली पर हाथ की पकड़ मज़बूत कुछ ऐसे ही जीवन का क्षण भविष्य की ओर चला था,

अर्जुन का दंभ

अर्जुन का दंभ kavita

अश्वों की हिनहिनाहट तलवारों की टनटनाहट वह हाथियों की चिंघाड़ मची, वीमत्स चीत्कार, गोधुली का आसमान वह रक्तरंजित स्वाभिमान सब कुछ क्षत विक्षिप्त और अभिशप्त आज आमने सामने कर्ण और अजानुबाहु दोनों सशक्त और आश्वस्त, चलता जब कर्ण का बाण

रोटीयाँ

रोटीयाँ kavita

छोटी सी गोल गोल मोटी हैं रोटीयाँ, इन्सान की आँखें खोलती हैं रोटीयाँ, है दुनिया यह बेबस इस भूख के आगे इस भूख को बेबस करती हैं रोटीयाँ, मिलता है ख़ून बनके पसीना किसान का उस ख़ूनी पसीने से महकती

भीष्म

भीष्म kavita

हर पल हो रहा क्षरण शैय्या पर लेटा मैं फिर भी स्वीकार है बाणों का वरण, कब आएंगे सूर्य उत्तरायण और मेरा करेंगे हरण, हरण चैतन्यता से निर्वाण का बंधन से मुक्ति का, बंधन वचन का, धर्म का, कर्म का

माँ

माँ kavita

खोली जब से मैंने आँखें अपने को तुझ में है पाया, होश संभाला जब से मैंने मुझ में दिखता तेरा साया, देखा है खुद को बढ़ते हुए अपनी हर बढ़त में थोड़ा थोड़ा तुझे घटते हुए, मेरा बढ़ना तेरा घटना

कर्ण

कर्ण kavita

वह अतृप्त और अभिशप्त खड़ा उस काल खण्ड के समक्ष गवाह बना कुरूक्षेत्र चल रहा है द्वंद एक तरफ़ है धर्म और एक तरफ़ आदर्श आदर्श मित्रता के मान का मान से स्वाभिमान का है प्रबद्ध चल रहा है युद्ध

अपूर्ण

अपूर्ण kavita

पर्वत मैं, समुन्दर मैं और मैं अखण्ड स्थिर मैं, अनंत मैं और मैं ब्रम्हाण्ड रंगहीन, नीरस और सर्वव्यापी सक्षम, अविनाशी और मर्यादित अंतर्मुखी, पुरातन और बैरागी, तू प्रकृति, तू धरा और तू रंगीन चपल, तरूण और तू तरंगिणी तेरे रंग

दूरियाँ

दूरियाँ kavita

होता था जब मैं एक पौधा उगती कोंपल मेरे तन में फल से मेरा ना था नाता बाड़ों का गहरा था पहरा ज्यों ज्यों खड़ा मैं दक्ष हुआ पौधे से मैं वृक्ष हुआ, कोंपल से पत्तों का होना सब कुछ

शब्द

शब्द kavita

शब्द भावना शब्द चेतना प्रस्फुटित होती संरचना शब्द शक्ति है शब्द अग्नि है शब्द होम की संविदा शब्द सार्थक सर्वथा, शब्द शक्ति है भाषा की भावों की अभिलाषा की, बड़े बड़े यह शाहकार शब्द बिना यह सब बेकार, शब्दों में