Poems written by mritunjaya99

मेरी ज़िंदगी

मेरी ज़िंदगी ghazal

“मोहरा बनना मुझे कभी कहीं कबूल रहा नहीं, ज़िन्दगी मुश्किल सही,पर अपनी शर्तों पे जी मैंने” “तकदीरों को मुझ पे मेहरबान होनी ही पड़ा, अपनी तदबीरो में कभी कोई कमी नहीं की मैंने” “दुनिया बेहद हसीं, ज़िन्दगी पुरबहार होने लगी,

हक़ीकत-ए-ज़िन्दगी

हक़ीकत ए ज़िन्दगी kavita

लम्हे बुरे वक़्त के बड़े ही काम के निकले मेरी आस्तीनों में से कई अज़ीज़ साँप निकले, दुनिया वाले जिस पे आँखें मूँद के गुज़रे हम उस रह गुज़र पे भूल से भी नहीं निकले, रंग -रूप, पैराहन पे ही

ख़्वाहिशें

ख़्वाहिशें kavita

आज फिर माँ की यादों ने घेर लिया, जी चाहा मैं फिर से शरीर* हो जाऊँ तू मुझसे मिलने का मन बना तो सही, तेरे लिए मैं ख़ुद ही रास्ता हो जाऊँ हवस-ए-बदन को उल्फ़त बताने वालों, जी में आता

वो मोहब्बतें वो ज़माना

वो मोहब्बतें वो ज़माना ghazal

अब कहाँ वो पहले जैसी मोहब्बतें, अब कहाँ वो पहले के जैसा ज़माना वो पहले सा नज़रों का मिलना कहाँ अब, कहीं खो गया वो शर्मा के नज़रें झुकाना अब कहाँ वो ख़तों का लिखना-लिखाना, क़ासिद के दिखते ही दिल

आईना ए जहां

आईना ए जहां kavita

सबने जिसको धूप कहा, हमें वही सूरज का नूर लगा पसीने की रोशनाई* से नसीब के हिस्से लिखे हमने कई दुश्वारियाँ अपने हिस्से हमने अपने आप लिखीं उसूल-ओ-ईमान पे चलने के कड़वे घूँट ख़ूब चखे हमने बदलते वक़्त पे ग़ैरों

फ़लसफ़ा ए आदमी

फ़लसफ़ा ए आदमी kavita

विसाल-ए-महबूब तो शानों पे सर फ़िराक़-ए-महबूब तो ज़ानू पे सर बग़लगीर महबूब तो हसीन तन्हाइयाँ फ़िराक़-ए-महबूब तो खूँखार तन्हाइयाँ ख़ुमार-ए-कामयाबी तो मैक़दे दुश्वार-ए-हालात तो सनमक़दे बोसा-ए-कामयाबी तो मेरी तदबीरें गर्दिश-ए-दौरां तो अपनी फूटी तकदीरें शोहरतें दौलतें तो यार हम-प्याले खाली

ख़ुदा की रहमतें

ख़ुदा की रहमतें kavita

ख़ुदा के हाथ की थपकियां सर पे जब भी चाहीं मैं माँ के आँचल का एहसास सिर पे ले आया ख़ुदाई महसूस करने के अरमान जब जगे, मैं दरख्तों को अपने सीने से लगा आया उदासीयों ने जब भी आगोश