Poems written by Shubhangi Khare

वो खारा काग़ज़

वो खारा काग़ज़ azad nazm

मेरी किताबों की अलमारी में एकदम अन्दर , दुबकी हुई सी बैठी तुम्हारी कविताओं की कॉपी, पन्ने पलटते पलटते ज़ुबां पर इक पन्ने का खारा स्वाद आया है अचानक … कोरा है ये पन्ना.. कलम शायद ख़ामोश रही होगी यहाँ,

बहुत देर हो चुकी

बहुत देर हो चुकी azad nazm

ना मरहम लगाओ अब इन पुराने सूखे ज़ख्मों पर, देखो ये फिर ताज़ा हो चले हैं ना कुरेदो अब इन पर चढ़ी इस छाल को, देखो ये फिर सुर्ख़ हो चले हैं… बहुत देर हो चुकी कि अब तुम लौट

इक नई शुरूआत

इक नई शुरूआत azad nazm

न जाने इस दिमाग में यादों के कितने कमरे हैं, कुछ खुले पड़े हैं और कुछ बरसों से बंद उन कमरों की चाबी नहीं मेरे पास, शायद कुछ रिश्तों के साथ ये कमरे भी ख़त्म हो चुके हैं, सीलन पडीं

तेरी यादें

तेरी यादें azad nazm

कभी यूँ ही बेवजह रो लेती हूँ, ये जो तेरी यादें अटकी पड़ीं हैं दिल में, आसूँ के साथ शायद बह कर निकल जाएँ.. थोड़ा सा मुझे भी चैन आए.. जो तेरा चहरा मैं भुला पाऊँ, अगली बार जब दिखो

वक़्त की सुराही

वक़्त की सुराही azad nazm

वक़्त की सुराही से कुछ बूँद लम्हे चुराने की कोशिश में हूँ, बचपन की कहानी के उस कौवे की तरह, कंकड़ ड़ाल कर देखूँ, शायद थोड़ा वक़्त और मिल जाए, पर देखती हूँ कि सुराही में ही दरार पड़ी है,

रूमानियत

रूमानियत kavita

चलो आज थोड़े रूमानी हो जाएँ, ज़िन्दगी से पल चुरा कर, ख़ुद में खो जाएँ चलो आज थोड़े रूमानी हो जाएँ, गुलाबी ठण्ड सी पड़ने जो लगी है सुबह ओस की बूँदों में भीगने लगी है जो सुबह, ऐसे मौसम