Poems written by Dr. Himanshu Sharma

Dr. Himanshu Sharma

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in sanskrit there is a sukti "ekoaham na bhuto na bhavishyati" it means "nobody was like me in the past and no body will be lyk me in future which implies iam unique" and really mean it that iam unique in every aspect!!!!Nothing yaar.. a simple guy with some complications

विदाई का क्षण…!!!

विदाई का क्षण...!!! kavita

ये तो पल दो पल की दूरी है न समझो मेरी विदाई है इस मन से जुड़ी हुई हूँ तुमसे ये बस ज़हनी जुदाई है, मन की मानो तो कहता है कि बस यहीं रुक जाओ ज़हन की मानो, नहीं,

ये मुल्क मेरा!!!

ये मुल्क मेरा!!! kavita

ये क्या देखता हूँ दुनिया में तेरी कि मस्जिद भी जल रही है आज किसी मंदिर के साथ में, नाम लेकर उपरवाले का लड़ रहे हैं सब और जल रहीं हैं नफ़रत की मशालें सभी के हाथ में, नाम है

इस पाप की डगर पे…..!!!!

इस पाप की डगर पे.....!!!! vyang

इस पाप की डगर पर नेता दिखाओ चल के, ये देश है तुम्हारा खा जाओ इसको तल के! अच्छाइयों को रखना सदा यूँही सिराहने, दिखे जहाँ पे पैसे आ जाना उनको खाने! बदहज़मी हो न जाये खाओ पैसा संभल के!

ये दिल क्या है

ये दिल क्या है ghazal

हालात-ऐ-दिल न जाने क्यों मुझे मजबूर कर गया, दिल-ऐ-नाशाद मेरे ख़ुशी का पैमाना चूर कर गया| हुस्न दिया गया था तुझे दीवानगी बढ़ने को जानम, मगर ये तेरा हुस्न तुझे क्यों ज़रा मग़रूर कर गया| परवाना तेरे हुस्न का ढूँढता

कल्पना और तथ्य

कल्पना और तथ्य vyang

ये देखिये साहिब कि ज़िन्दगी कितनी उबाऊ हो गयी है बाज़ारों में इंसानों के हाथों यूँ मौत भी बिकाऊ हो गयी है, दिखाकर डर मौत का वो सभी को माल अपना बेचते हैं मर न जाए कम्बख़्त ग्राहक बेचने के

अतिश्योक्तियाँ

अतिश्योक्तियाँ vyang

मांस-मदिरा निषेध हेतु कार्यक्रम किया गया आयोजित जो कि था शहर के मदिरा-किंग के द्वारा ही प्रायोजित, मांग थी कि सभी तमोगुणी चीज़ों का उपभोग बंद करें डिसाइड हुआ कि इसी ख़ुशी में चिकन का सेवन करें, एक नेता माईक

खुशियों के मायने

खुशियों के मायने kavita

खुशियों को ढूँढते हो क्यों ये खुशियाँ तो दिल में रहती हैं कभी मुस्कराहट बन जाती हैं कभी अश्क़ बन बहती हैं, ये तो बस मोहताज हैं उन चंद लफ़्ज़ों की जो दिन बना दें जिन्हें सुनते ही इंसान अपने

सीखो

सीखो ghazal

हक़ अगर जाताना है तो हक़ निभाना सीखो वीरों की क़ुर्बानियों को तुम सराहना सीखो, जलते-जलाते हो जाएगा ख़ाक ये गुलशन हो सके तो नफ़रत की चिता जलाना सीखो, हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर लड़ते रहे गर तो दुश्मन के दिए

जवानों के लिए

जवानों के लिए kavita

जिनके मुस्तकबिल से ये चमन हरा-भरा है जिनके ही कारण सुरक्षित ये अपनी धरा है, कारगिल के दुर्गम जगहों को बचाया देकर जान अपनी, अमर है हर जवान वो कहाँ मरा है? ख़ून की हर बूँद से सींचा है इसे

मोहब्बत की बात कहें

मोहब्बत की बात कहें kavita

बहुत रह लिए चुपचाप अभी कुछ अपने जज़्बात कहें, आओ बैठें नदी के तीर कुछ मोहब्बत की बात करें, तेरा मिलना मेरी खुशनसीबी इसे किस्मत की सौगात कहें, लब खामोश रहें तो क्या आँखें आपस में बात करें, दिल की

मेरे अरमान!!!

मेरे अरमान!!! kavita

थोड़ी सी ज़मीन है मेरी थोड़ा सा ये आसमान है, जिस तलक जाये नज़र ये बस मेरा इतना सा जहान है, ढूँढा चैन को मगर मिला नहीं भूल गया हूँ रखकर यहीं-कहीं, मिल जाये तो चैन आ जाएगा या फिर

हम चले थे

हम चले थे ghazal

हम चले थे दुनिया जानिबे को समझने खुद को समझने की फुर्सत ही न मिली, मोहब्बत की हसरतें पाली थीं बहुत मगर तू सामने आया तो वो हसरत ही न मिली, कहते हैं सब मोहब्बत हक़ीकत में होती है मगर

कशमकश…!!!

कशमकश...!!! kavita

कुछ याद करूँ या फिर कुछ भूलूँ रहूँ ज़मीन पर या फिर नभ छू लूँ, कशमकश में बीत जाएगी ज़िन्दगी सोचता हूँ क्यों मझधार में यूँ झूलूँ, दायरे बनाये थे गैरों के लिए मगर घेरे गए उस दायरे में सब

शंख-नाद…!!!

शंख नाद...!!! kavita

एक नाद भयंकर उठ चुका है रणभेरी बज उठी भयंकर है, ये युद्ध बड़ा ही भीषण है लड़ना बनकर अभयंकर है, संघर्षरत है मेरा भारतवर्ष जन-जन में चेतना जागी है, देख दुर्दशा भारत माँ की हर लाल में वेदना जागी

लाड़ी तू सीखेगी गाड़ी!!!

लाड़ी तू सीखेगी गाड़ी!!! hasya

एक दिन छुट्टी की सुबह मैं ज़रा अखबार पढ़ रहा था, बीवी के रहते इतनी शान्ति है है गड़बड़ ये सोचकर डर रहा था, इतने में इस मन की शान्ति का मानो हो गया खुद से ही क्लेश, सुबह सुहानी

आज़ादी के परवाने!

आज़ादी के परवाने! kavita

रौशन हुई आग को बुझा सकता है कौन, सरफ़रोशों की हस्ती मिटा सकता है कौन? जो बांधकर निकले हैं सर पर कफ़न उन्हें, नाम लेकर मौत का डरा सकता है कौन? खेलते हैं तूफ़ानों से नादान बनकर वरना, तूफ़ानों से

रोटी और राजनीति!!

रोटी और राजनीति!! vyang

सुबह जब निकला मैं गंतव्य को जाने के लिए, एक श्वान परिवार लगा रहा था कचरे के ढेर के आसपास चक्कर ताकि मिल जाए कुछ खाने के लिए देखा कुछ देर बाद तो माता के मुंह में था रोटी का