Poems written by विनोद सिन्हा "सुदामा"

ज़िन्दगी एक मरीचिका

ज़िन्दगी एक मरीचिका kavita

उम्र गुज़ार दी साथ चलते – चलते फिर भी क्यों लगती है यह ज़िन्दगी एक अजनबी सी…? मंज़िलें क्यों वैसी नहीं है लगतीं जैसी थी सपनों में दिखा करतीं जो भी पीछे छोड़ा या पाया अब तक अलग तो नहीं

ख़्वाब

ख़्वाब kavita

ख़्वाबों की दुनिया में बिचरता यह मन कभी कभी न चाहते हुए भी कितने रंगों की रंगोली में रंग जाता है और मैं इन्हीं रंगों को यथार्थ समझ मन बहलाने की कोशिश करने लगता हूँ पर क्या इस क्षणिक अहसास