Poems written by Atul

बेअक्ल पुरखे

बेअक्ल पुरखे azad nazm

पुरखे चढ़े रहते हैं कंधों पर बेताल की तरह सदियों बाद भी, रीति रिवाज़ों और परम्पराओं के नाम पर, पर हम ढोते हैं उन्हें जन्म से लेकर मृत्यु तक, पूरी उम्र बिना सवाल के कोई दोहराते हैं वही जो पीढ़ियाँ

कवि

कवि azad nazm

वो जीता है काग़ज़ों में कई ज़िन्दगी हर रोज़, मगज़ से निकल पन्नों तक आते कई बिम्ब उलझ जाते हैं सुलझाता है उन्हें अँधेरे में बैठ, शब्दों से बुनकर गढ़ता है नए चित्र, टांगता है ख़यालों को सृजन की ऊँचाई