Poems written by Anand Srivastav

वो

वो vyang

जो मूक दर्शक होते हैं किसी नारी के अपमान का ; जो प्रतिकार नहीं करते कभी किसी के अत्याचार का ; जो मौन स्वीकृति देते हैं किसी के भी व्यभिचार की ; जो स्वयं तो अत्याचार सहते हैं दूसरों को

विमुख

विमुख kavita

अपने जन्म के मूल उद्देश्य को भूलता जा रहा है गुरुकुल आज धन की लोलुपता से बनता गया यह व्यापार । उच्च शिक्षा हो गई उच्चतर निम्न बन कर हो गया व्यापार नियमों से सजी धजी देखो नचाता आज संसार

कर्म कर तू, कर्म कर

कर्म कर तू, कर्म कर kavita

कर्म कर तू, कर्म कर कर्म से कृष्ण तो कर्म से राम है यह जगत या वह जगत, कर्म ही प्रधान है । कर्म कर तू, कर्म कर कर्म श्रेष्ठ, कर्म धर्म कर्म ईश्वर का अवतार है बना खुद को

कायर…!

कायर...! kavita

कायर, अगुणी, निर्लज्ज बेहया हूँ, अगणित, अशुद्ध कम्पित, लज्जित अभागा हूँ, ना युद्ध ज्ञाता ना गर्व से छाती लहराता पछताता, पथ-पथ, पग-पग ठोकर खाता अत्याचार, दुराचार व्यभिचार, अनाचार सभी का पोषण दाता हूँ। केवल करता कर्म और भाग्य से भी

कुहासा…!

कुहासा…! kavita

वो जलद से संकीर्ण कर्ण आज तरुवर से भी नीचे आई बिखरी है, आलस्ता से परिपूर्ण नव कालिंदी पर हाथ फेरते । भानु को ग्रास, दे चंद्रप्रकाश उज्जवल और स्पष्ट आभास किंचित विधु पर छाई वह – घोर क्रीड़ा में

घुम चुका है…आईना !

घुम चुका है...आईना ! kavita

बदल चुकी है परिस्थिति बदल चुका है सार परिस्थिति बदलने पर राम ने लिया था कृष्णावतार | जाति-पाति का कारण उस समय कुछ और था , पर अब का समय कुछ और है | जो थे दलित-कुचित वो तो अब

दंश

दंश kavita

हर परिवार में एक गांधी होता है , जो अपने समर्पण के बदले अपने ही परिवार की गाली सुनता है ; अपने कर्मों से तृप्त मनुष्यों की चाटुकारिता को सहता है ; अपनों की अज्ञानता पर कलपता है और मर

पिंजड़े का तोता

पिंजड़े का तोता kavita

मैं हूँ पिंजड़े का तोता अपना जीवन जी रहा हूँ, किसी की आशाओं और अभिलाषाओं के लिये; मैं हर पल की घुटन को पी रहा हूँ । सत्य कहूं – तो सुख से अधिक मुझे दु:ख है – कि मेरा

मैं पूछता हूँ

मैं पूछता हूँ kavita

मैं पूछता हूँ – कौन महान है? वो, जो इसे हिन्दू – उसे मुसलमान, इसे सिख – उसे इसाई कहता है; या वो – जो इन्हें इन्सान समझता है; या वो – जो इन्हें एक साथ रखकर इनका दंश झेलता

मैं हूँ बचपन

मैं हूँ बचपन kavita

मैं हूँ बचपन जिससे बच्चे रुठे हैं, मैं हूँ बचपन जिससे माँ-बाप रुठे हैं। मैं हूँ बचपन जो घर-आँगन बाग-बगीचे गली-मुहल्ले को तरसता है। मैं हूँ बचपन, उसे खोजता जिसके बिन मैं अधूरा हूँ। मैं हूँ बचपन जिससे बड़प्पन रुठा है, मैं हूँ बचपन जिससे लड़कपन

मैं हूँ सृष्टि

मैं हूँ सृष्टि kavita

मैं हूँ सृष्टि, मैं हूँ तृप्ति, मैं ही हूँ सृजन का आधार, मेरे बिना जग सूना मैं हूँ मूलाधार। मैं ही धृता, मैं ही कृता मैं ही सर्वप्रधान, मैं ही योग, मैं ही भोग मैं ही करती सर्वकल्याण। कारण कष्ट का

विकाश

विकाश kavita

एक दिन जब सब जगह इमारतें बन जायेंगी, धूप वाली जगहों की तब कीमतें बढ़ जायेंगी। अनाज इठ्लायेगा तब अपनी कीमत पर और गहने कौड़ियों में बिक जायेंगे। सुलभ होगा ऐश्वर्य तब बस, मनुष्यता कहीं खो जायेगी, होगीं कहाँ तब बादलों

मकान

मकान kavita

मेरे स्वपनों का महल, जैसे कीचड़ में कमल, जैसे गम में उमंग; एक – एक ईट उठाता, परत दर परत रंग चढ़ाता; कभी धुलता, कभी सुखता, कभी बस यूं ही कार्य रुक जाता। हताश – बैठे हुए शिला पर देख

मैं मजदूर हुँ !

मैं मजदूर हुँ ! kavita

मैं मजदूर हुँ और बहुत मजबूर हुँ; पर किससे, अपने कर्म से, अपने धर्म से, अपनी आवाम से, अपनी आदत से या उस धन से जो मालिक मुझे देता है; जिसमें मेरा घर मुश्किल से चलता है। मैं मजदूर हुँ,