Poems written by Prateek Garg

रणगाथा

रणगाथा kavita

युद्ध ही आदि है, युद्ध ही अंत है. युद्ध ही विकास है, युद्ध ही विनाश है. युद्ध ही तेरा धर्म है योद्धा, युद्ध ही तेरा इम्तिहान है. रणभूमि की गोद से निकला योद्धा, तू युद्ध से भी विशाल है. शिकन

मर्जानी मैं कमली

मर्जानी मैं कमली kavita

मद्धम मद्धम सुलगे तन, रात चाँदनी यूँ राख़ हो गयी. तेरी जलती उंगलियों की एक चुभन से, मर्जानी मैं कमली, मैं साख खो गयी. आहिस्ते आहिस्ते निकली सिसकियाँ, रात खामोशी में चित्तकार खो गयी. शर्म रखने वालों की गलियों में,

इज़हार

इज़हार kavita

एक शाम उस कॉफी शॉप में, घंटों तक उनके सामने बैठे रहे, उनकी बातों को सुनते रहे, कुछ बोलने से बचते रहे, नज़रों से खुद को छुपाते रहे, सफ़ेद कमीज़ को सौस से बचाते रहे, धड़कनों का शोर कहीं कानों