ज़िन्दगी Poems

ज़िन्दगी पर लिखी हुई नई कवितायेँ जो आपके दिल को छु लेंगी|

बोध

बोध kavita

सजा रंगमंच घोर छल प्रपंच, कर्म काण्डों का मायाजाल बना जी का जंजाल, त्रस्त बेहाल होना चाहता उन्मुक्त, पाना चाहता उसे जो है सबसे मुक्त, मुक्ति के लिए करता हर रीति का आलिंगन फिर कैसा यह बंधन, उठने के लिए

खुशी की पहचान

खुशी की पहचान kavita

एक रोज़ कहूँगी कि मैं अपना अक्स जानती हूँ हाँ मैं भी अपनी हर खुशी को पहचानती हूँ एक पंछी सी आसमान में उड़ सकूँ पंख फैला मदहोश चलती पवन से मिल सकूँ एक छोटा सा मेरा भी घोसला हो

ख़ुदा की रहमतें

ख़ुदा की रहमतें kavita

ख़ुदा के हाथ की थपकियां सर पे जब भी चाहीं मैं माँ के आँचल का एहसास सिर पे ले आया ख़ुदाई महसूस करने के अरमान जब जगे, मैं दरख्तों को अपने सीने से लगा आया उदासीयों ने जब भी आगोश

मौत या ज़िन्दगी

मौत या ज़िन्दगी kavita

इसका आगमन होता है सिर्फ़ एक बार लेकिन सबके मन का बन जाता है भार, कोई करता है इसका बेसब्री से इंतिज़ार तो कोई इसके सामने हो जाता है लाचार, कुछ इससे भागते हैं दूर तो कुछ इसमें ढूंढते हैं

प्रेरणा

प्रेरणा kavita

शाम को द्वार पे विदा कर के ज्यों ही रात्रि के साये में बिस्तर की गोद में समाया थकान से बोझिल पलकों ने मुझे मेरे ख़्वाबों से मिलवाया ख़्वाब में आई एक मूरत कुछ जानी कुछ अनजानी सी कुछ सकुचाई

शिकायत

शिकायत ghazal

हर फ़ल्सफ़े का ज़ौक़ नया होता है, तुझसे मुलाक़ात का शौक़ नया होता है। दूर आँधी में है गिरफ़्तार मेरी किश्ती, फिर भी साहिल पे उतरने का अंदाज़ नया होता है। मैं तो मिलता हूँ अमीरों से, ग़रीबों से यकसाँ,

समुद्र

समुद्र kavita

तू मुझे बहुत रास आया आदि काल से तू हमसाया, जब हुआ था मंथन निकला था हलाहल स्वीकारा एक अवधूत ने वर्षों से पी रहा तू वह गरल, जो है निष्कर्ष खण्डित होती प्रकृति  का असीमित महत्वाकांक्षाओं का तू ही

हौसला

हौसला kavita

तमन्ना तो मुझे भी थी ऊँची उड़ानों की ता उम्र बस हौसला जुटाता रहा, समंदर की रेत से टीला बनाने की जब ठानी ता उम्र बस घरौंदे बनाता रहा, मिटाता रहा, रंगरेज़ बन इन्द्रधनुष से चला रंगने सब को ता

यात्रा

यात्रा kavita

दिन चढ़ेगा आज सूरज भी निकलेगा लेकिन, थोड़ी सी ठंडक होगी फ़िज़ाओं में और साथ घुलेगी कुछ महक भी मद्धम सी, इन हवाओं के रस्ते होंगे नदियाँ होंगी, धाराओं को चीरकर बांधों के ऊपर से निकलकर हवाएँ चलेंगी ऐसे जैसे

सच्चा दोस्त

सच्चा दोस्त kavita

वो जो हार में जीत का सबब बन जाये, अंधेरे में उजाले की किरण खोज लाए, ग़म में खुशियों की आहट बन जाये, वो जो तुम्हारे राज़ को अपने में दफ़न कर जाये, तुम जो लड़खड़ायो संभल कर आगे बढ़ना

कशमकश…!!!

कशमकश...!!! kavita

कुछ याद करूँ या फिर कुछ भूलूँ रहूँ ज़मीन पर या फिर नभ छू लूँ, कशमकश में बीत जाएगी ज़िन्दगी सोचता हूँ क्यों मझधार में यूँ झूलूँ, दायरे बनाये थे गैरों के लिए मगर घेरे गए उस दायरे में सब

चले जायेंगे

चले जायेंगे ghazal

कारवां छोड़कर मेरे हमसफ़र चले जायेंगे हमें मालूम था सीने से लगकर चले जायेंगे अभी कमज़ोर दिखते हैं ज़रा से पर निकलने दो ये पंछी भी किसी रोज़ उड़कर चले जायेंगे मेरे हालात का तुम भी सनम जमकर मज़ा लूटो

अग्रीमेंट ज़रूरी है

अग्रीमेंट ज़रूरी है vyang

मर्ज़ भले कोई हो ट्रीटमेंट ज़रूरी है जंक फ़ूड के साथ सप्लिमेंट ज़रूरी है रखिये न इसे बाँधकर ज़ोर ज़बरदस्ती से दिल की सेहत के लिए मूवमेंट ज़रूरी है खिल के हँसे मुस्कुराए तो सोचता है दिल क्या फूलों को

कवि

कवि azad nazm

वो जीता है काग़ज़ों में कई ज़िन्दगी हर रोज़, मगज़ से निकल पन्नों तक आते कई बिम्ब उलझ जाते हैं सुलझाता है उन्हें अँधेरे में बैठ, शब्दों से बुनकर गढ़ता है नए चित्र, टांगता है ख़यालों को सृजन की ऊँचाई

कर्म कर तू, कर्म कर

कर्म कर तू, कर्म कर kavita

कर्म कर तू, कर्म कर कर्म से कृष्ण तो कर्म से राम है यह जगत या वह जगत, कर्म ही प्रधान है । कर्म कर तू, कर्म कर कर्म श्रेष्ठ, कर्म धर्म कर्म ईश्वर का अवतार है बना खुद को

यूँ ही चल दिए हैं अजनबी…

यूँ ही चल दिए हैं अजनबी... kavita

यूँ ही चल दिए हैं अजनबी राहों की ओर कहीं तो मंज़िल होगी कहीं तो ठिकाना होगा, आरज़ू-ए-दिल तो बंजारों की तरह चलता रहा अब अपने शौंक की खातिर मुझको भटक जाना होगा, बहुत दूर तक चला जाता है मेरी

इंसानियत

इंसानियत kavita

ठहरे हूए वक़्त की दास्ताँ मैं बयान कैसे करूँ बंद हैं दरवाज़े इबादत घरों के मैं अज़ान कैसे करूँ दहशतगर्दी का आलम है हर गली हर नुक्कड़ पर सभी मज़हबों से ऊपर उठकर मैं भाईचारे का फ़रमान कैसे करूँ सुर्ख़रू

नदी

नदी kavita

नदी को बहने दो बहती रहने दो उसे बांधो मत उसकी उन्मुक्त जलधार को अपनी स्वार्थ सिद्धि के निमित्त बहने दो उसे अविराम, अविकल क्योंकि अनंत अवरोधों के बीच भी निरंतर प्रवाहमान रहना ही तो है उसकी प्रकृति और नियति

खुशियों के मायने

खुशियों के मायने kavita

खुशियों को ढूँढते हो क्यों ये खुशियाँ तो दिल में रहती हैं कभी मुस्कराहट बन जाती हैं कभी अश्क़ बन बहती हैं, ये तो बस मोहताज हैं उन चंद लफ़्ज़ों की जो दिन बना दें जिन्हें सुनते ही इंसान अपने

काश से घिरा जीवन

काश से घिरा जीवन kavita

काश! से घिरी जीवन की अपेक्षाएँ काश! कि ज़िन्दगी में कोई काश न आए काश! हम अपने हर सपने को हक़ीकत में जी पाएँ काश! इस काश को हम ज़िन्दगी से मिटा पाएँ काश! हम सपनों को ज़िन्दगी से रूबरू

हम चले थे

हम चले थे ghazal

हम चले थे दुनिया जानिबे को समझने खुद को समझने की फुर्सत ही न मिली, मोहब्बत की हसरतें पाली थीं बहुत मगर तू सामने आया तो वो हसरत ही न मिली, कहते हैं सब मोहब्बत हक़ीकत में होती है मगर

रुक सी गयी तक़दीर

रुक सी गयी तक़दीर kavita

रुक सी गयी तक़दीर मेरी सही वक़्त के इंतेज़ार में पता भी न चला कब आई और कब चली गयी, वक़्त नहीं ठहरा मेरे इंतेज़ार में जैसे नहीं ठहरता दरिया का पानी, बहता चला जाता है अपने बहाव में बैठा

कायर…!

कायर...! kavita

कायर, अगुणी, निर्लज्ज बेहया हूँ, अगणित, अशुद्ध कम्पित, लज्जित अभागा हूँ, ना युद्ध ज्ञाता ना गर्व से छाती लहराता पछताता, पथ-पथ, पग-पग ठोकर खाता अत्याचार, दुराचार व्यभिचार, अनाचार सभी का पोषण दाता हूँ। केवल करता कर्म और भाग्य से भी

कुछ लोगों को कुछ उम्मीदें हैं

कुछ लोगों को कुछ उम्मीदें हैं kavita

ख़ुदा ने दिए हैं जिस्म-ओ-जान बेशर्त मुझे मैं उस एहसान को चुकाने के लिए जिए जाता हूँ, कुछ लोगों को कुछ उम्मीदें हैं मुझसे मैं उन रिश्तों को निभाने के लिए जिए जाता हूँ, अभी भी कई चराग़ हैं बुझे

मेरी ज़िंदगी

मेरी ज़िंदगी ghazal

“मोहरा बनना मुझे कभी कहीं कबूल रहा नहीं, ज़िन्दगी मुश्किल सही,पर अपनी शर्तों पे जी मैंने” “तकदीरों को मुझ पे मेहरबान होनी ही पड़ा, अपनी तदबीरो में कभी कोई कमी नहीं की मैंने” “दुनिया बेहद हसीं, ज़िन्दगी पुरबहार होने लगी,

टूटे जो ख़्वाब मेरे

टूटे जो ख़्वाब मेरे kavita

टूटे जो ख़्वाब मेरे आईने की तरह हम कुछ यूँ बिखरे, जैसे रेत का एक महल और हम, उसमें बसे जज़्बात की तरह, उठे जो तूफ़ान दिल में चहरे पे खिंची लकीरों की तरह, हम कुछ यूँ खोये, जैसे मोहब्बत

ग़ुलाम

ग़ुलाम kavita

वह जो बेड़ियों में जकड़ा स्वयं में सिमटा खुद की कीमत पर आ रहा दूसरों के काम वह ग़ुलाम, वह जो प्रतीत होता स्वतंत्र है स्वच्छंद मोहपाश में जकड़ा अपनी आसक्तियों का वह ग़ुलाम, स्वयं की सन्तुष्टि की चाह में

अब हम ही कहाँ थे

अब हम ही कहाँ थे kavita

आई जो खुशियाँ, ग़म को भुलाते रह गए दूसरों के दर्द से वाकिफ़ ही कहाँ थे आज जो आया सफ़र में, कल को ढूंढते रह गए किसी और से कदम मिलाने का होश ही कहाँ था खड़े जो हुए ठोकरों

रोटीयाँ

रोटीयाँ kavita

छोटी सी गोल गोल मोटी हैं रोटीयाँ, इन्सान की आँखें खोलती हैं रोटीयाँ, है दुनिया यह बेबस इस भूख के आगे इस भूख को बेबस करती हैं रोटीयाँ, मिलता है ख़ून बनके पसीना किसान का उस ख़ूनी पसीने से महकती

मुसाफ़िर

मुसाफ़िर kavita

सुन ओ रास्ते से जाते मुसाफ़िर मुझे भी साथ तू ले चल मुसाफ़िर, साथ-साथ तय कर लेंगे ये सफ़र, दो ही पल साथ अपने मुझको ले-ले आज ज़रा, ओ मुसाफ़िर, यादों के कुएँ से निकाल पियेंगे पानी ख़्वाहिशों के पथ