ज़िन्दगी Poems

ज़िन्दगी पर लिखी हुई नई कवितायेँ जो आपके दिल को छु लेंगी|

यूँ ही चल दिए हैं अजनबी…

यूँ ही चल दिए हैं अजनबी... kavita

यूँ ही चल दिए हैं अजनबी राहों की ओर कहीं तो मंज़िल होगी कहीं तो ठिकाना होगा, आरज़ू-ए-दिल तो बंजारों की तरह चलता रहा अब अपने शौंक की खातिर मुझको भटक जाना होगा, बहुत दूर तक चला जाता है मेरी

इंसानियत

इंसानियत kavita

ठहरे हूए वक़्त की दास्ताँ मैं बयान कैसे करूँ बंद हैं दरवाज़े इबादत घरों के मैं अज़ान कैसे करूँ दहशतगर्दी का आलम है हर गली हर नुक्कड़ पर सभी मज़हबों से ऊपर उठकर मैं भाईचारे का फ़रमान कैसे करूँ सुर्ख़रू

नदी

नदी kavita

नदी को बहने दो बहती रहने दो उसे बांधो मत उसकी उन्मुक्त जलधार को अपनी स्वार्थ सिद्धि के निमित्त बहने दो उसे अविराम, अविकल क्योंकि अनंत अवरोधों के बीच भी निरंतर प्रवाहमान रहना ही तो है उसकी प्रकृति और नियति

खुशियों के मायने

खुशियों के मायने kavita

खुशियों को ढूँढते हो क्यों ये खुशियाँ तो दिल में रहती हैं कभी मुस्कराहट बन जाती हैं कभी अश्क़ बन बहती हैं, ये तो बस मोहताज हैं उन चंद लफ़्ज़ों की जो दिन बना दें जिन्हें सुनते ही इंसान अपने

काश से घिरा जीवन

काश से घिरा जीवन kavita

काश! से घिरी जीवन की अपेक्षाएँ काश! कि ज़िन्दगी में कोई काश न आए काश! हम अपने हर सपने को हक़ीकत में जी पाएँ काश! इस काश को हम ज़िन्दगी से मिटा पाएँ काश! हम सपनों को ज़िन्दगी से रूबरू

हम चले थे

हम चले थे ghazal

हम चले थे दुनिया जानिबे को समझने खुद को समझने की फुर्सत ही न मिली, मोहब्बत की हसरतें पाली थीं बहुत मगर तू सामने आया तो वो हसरत ही न मिली, कहते हैं सब मोहब्बत हक़ीकत में होती है मगर

रुक सी गयी तक़दीर

रुक सी गयी तक़दीर kavita

रुक सी गयी तक़दीर मेरी सही वक़्त के इंतेज़ार में पता भी न चला कब आई और कब चली गयी, वक़्त नहीं ठहरा मेरे इंतेज़ार में जैसे नहीं ठहरता दरिया का पानी, बहता चला जाता है अपने बहाव में बैठा

कायर…!

कायर...! kavita

कायर, अगुणी, निर्लज्ज बेहया हूँ, अगणित, अशुद्ध कम्पित, लज्जित अभागा हूँ, ना युद्ध ज्ञाता ना गर्व से छाती लहराता पछताता, पथ-पथ, पग-पग ठोकर खाता अत्याचार, दुराचार व्यभिचार, अनाचार सभी का पोषण दाता हूँ। केवल करता कर्म और भाग्य से भी

कुछ लोगों को कुछ उम्मीदें हैं

कुछ लोगों को कुछ उम्मीदें हैं kavita

ख़ुदा ने दिए हैं जिस्म-ओ-जान बेशर्त मुझे मैं उस एहसान को चुकाने के लिए जिए जाता हूँ, कुछ लोगों को कुछ उम्मीदें हैं मुझसे मैं उन रिश्तों को निभाने के लिए जिए जाता हूँ, अभी भी कई चराग़ हैं बुझे

मेरी ज़िंदगी

मेरी ज़िंदगी ghazal

“मोहरा बनना मुझे कभी कहीं कबूल रहा नहीं, ज़िन्दगी मुश्किल सही,पर अपनी शर्तों पे जी मैंने” “तकदीरों को मुझ पे मेहरबान होनी ही पड़ा, अपनी तदबीरो में कभी कोई कमी नहीं की मैंने” “दुनिया बेहद हसीं, ज़िन्दगी पुरबहार होने लगी,

टूटे जो ख़्वाब मेरे

टूटे जो ख़्वाब मेरे kavita

टूटे जो ख़्वाब मेरे आईने की तरह हम कुछ यूँ बिखरे, जैसे रेत का एक महल और हम, उसमें बसे जज़्बात की तरह, उठे जो तूफ़ान दिल में चहरे पे खिंची लकीरों की तरह, हम कुछ यूँ खोये, जैसे मोहब्बत

ग़ुलाम

ग़ुलाम kavita

वह जो बेड़ियों में जकड़ा स्वयं में सिमटा खुद की कीमत पर आ रहा दूसरों के काम वह ग़ुलाम, वह जो प्रतीत होता स्वतंत्र है स्वच्छंद मोहपाश में जकड़ा अपनी आसक्तियों का वह ग़ुलाम, स्वयं की सन्तुष्टि की चाह में

अब हम ही कहाँ थे

अब हम ही कहाँ थे kavita

आई जो खुशियाँ, ग़म को भुलाते रह गए दूसरों के दर्द से वाकिफ़ ही कहाँ थे आज जो आया सफ़र में, कल को ढूंढते रह गए किसी और से कदम मिलाने का होश ही कहाँ था खड़े जो हुए ठोकरों

रोटीयाँ

रोटीयाँ kavita

छोटी सी गोल गोल मोटी हैं रोटीयाँ, इन्सान की आँखें खोलती हैं रोटीयाँ, है दुनिया यह बेबस इस भूख के आगे इस भूख को बेबस करती हैं रोटीयाँ, मिलता है ख़ून बनके पसीना किसान का उस ख़ूनी पसीने से महकती

मुसाफ़िर

मुसाफ़िर kavita

सुन ओ रास्ते से जाते मुसाफ़िर मुझे भी साथ तू ले चल मुसाफ़िर, साथ-साथ तय कर लेंगे ये सफ़र, दो ही पल साथ अपने मुझको ले-ले आज ज़रा, ओ मुसाफ़िर, यादों के कुएँ से निकाल पियेंगे पानी ख़्वाहिशों के पथ

एक मासूम सी अठन्नी

एक मासूम सी अठन्नी azad nazm

एक मासूम सी अठन्नी मेरी जेब में बदमाश से रुपये से लग के गले खनकती है, इनके होने के एहसास से, मेरी जेब अब दमकती इसकी अल्हढ़ सी आहटों से, मेरी जेब कुछ मचलती है, ये मासूम क्या जाने दर्द

दंश

दंश kavita

हर परिवार में एक गांधी होता है , जो अपने समर्पण के बदले अपने ही परिवार की गाली सुनता है ; अपने कर्मों से तृप्त मनुष्यों की चाटुकारिता को सहता है ; अपनों की अज्ञानता पर कलपता है और मर

अंतर में अंतर

अंतर में अंतर doha

अंतर में अंतर पले, तब कैसे हो स्नेह अंतर से अंतर मिटे, तब हो देह विदेह अंतर = मन / भेद देख रहे छिप-छिप कली, मन में जागी प्रीत देख छिपकली वितृष्णा, क्यों हो छू भयभीत? छिप कली = आड़

हक़ीकत-ए-ज़िन्दगी

हक़ीकत ए ज़िन्दगी kavita

लम्हे बुरे वक़्त के बड़े ही काम के निकले मेरी आस्तीनों में से कई अज़ीज़ साँप निकले, दुनिया वाले जिस पे आँखें मूँद के गुज़रे हम उस रह गुज़र पे भूल से भी नहीं निकले, रंग -रूप, पैराहन पे ही

वो पल

वो पल kavita

समय की एक दीवार पर कुछ पल संभल कर चले, जो निकल गए श्रृंगार कर वो पल संभल कर चले, जो कुछ आरज़ू लिए ढले वो कभी नींद में आकर मिले, जो जीत कर बीते थे पल वो मुस्कान बन

हमारी अधूरी कहानी

हमारी अधूरी कहानी kavita

गिने चुने पलों में छुपी कुछ उन्माद की झड़ियाँ, बाकी पल सिमटा खींचने में तुम्हारी वापस ली हुई निशानी, कोई ऐसा न मिला तुम्हारे जाने के बाद जिसकी नज़रों की क़ुर्बत में बंधा पाऊँ, मेरी ख़ामोश लड़ियों का नायाब किनारा

तमन्ना

तमन्ना kavita

इल्तिजा है मेरी न कहे कोइ स्वर्गवासी मुझे इस शरीर से रुह निकल जाने के बाद, नहीं देखा है किसी ने सुने हुए स्वर्ग या नर्क को एहसास होता है इसका काफ़ी समय गुज़र जाने के बाद, स्वर्ग है इस

मेरे हिस्से की धूप

मेरे हिस्से की धूप kavita

मैं खुद के हिस्से की धूप मांगता हूँ कुछ और नहीं बस पल दो चार मांगता हूँ खूब जिया अब तलक साये में तेरे अब बस खुद का दीदार करना चाहता हूँ तेरे सपनों, ख़्वाहिशों के बोझ तले ढला मेरे

दूरियाँ कितनी भी हों

दूरियाँ कितनी भी हों kavita

दूरियाँ चाहे कितनी भी हों दो लफ़्ज़ ज़रूरी हैं मिटाने को यूँ ना समझो के सब कुछ खो गया हमारा देखो ज़माना बाक़ी है जीत जाने को, क्या हुआ के इस पल हार गए पूरा समा बाक़ी है जीत जाने

पिंजड़े का तोता

पिंजड़े का तोता kavita

मैं हूँ पिंजड़े का तोता अपना जीवन जी रहा हूँ, किसी की आशाओं और अभिलाषाओं के लिये; मैं हर पल की घुटन को पी रहा हूँ । सत्य कहूं – तो सुख से अधिक मुझे दु:ख है – कि मेरा

पश्चाताप

पश्चाताप kavita

रोज़ पश्चाताप, वही पुरानी गलती गलती न दोहराने का प्रण और प्रण पूरा न कर पाने का अफ़सोस, यह कहानी न जाने कितनों की “पश्चाताप” पर पश्चाताप कर ‘पश्चाताप’ करने की अनगिनत किस्सों पर आँसू बहाने की और वापिस हर

सफ़र

सफ़र kavita

जब मेरे सफ़र पर निकलने की आहट हो तो वही चार लोग हों जिनको मेरे होने का एहसास हो जो मेरी हँसी को समझें और जिनके आँसुओं से मेरे आँसू मिलते हों जो कभी चले हों मेरे साथ साथ मेरी

ख़्वाहिशें

ख़्वाहिशें kavita

आज फिर माँ की यादों ने घेर लिया, जी चाहा मैं फिर से शरीर* हो जाऊँ तू मुझसे मिलने का मन बना तो सही, तेरे लिए मैं ख़ुद ही रास्ता हो जाऊँ हवस-ए-बदन को उल्फ़त बताने वालों, जी में आता

बड़े होने लगे हैं

बड़े होने लगे हैं kavita

कलम की स्याही अब सूखने लगी है नज़्म कैसे लिखूं दोस्तों ज़हन अब दिल पे हावी होने लगा है, मासूमियत अपनी अब मैं खोने लगा हूँ दोस्तों अब मैं बड़ा होने लगा हूँ, दुनियादारी की बातें कुछ -कुछ समझ आने

हार से हार मत मानो तुम

हार से हार मत मानो तुम kavita

हारने से क्यों डरते हो तुम हार से हार मत मानो तुम, यदि जीवन में कुछ करना है हासिल तो हार को गले लगाओ तुम, असफ़लता सफ़लता की सीढ़ी है गिर कर संभलना ही तो ज़िन्दगी है, आंसू तो केवल