Poems classified as: व्यंग्य

यह शैली व्यंग्य रस से पूर्ण कविता शैली है| इसमें साधारनतया हास्य के माध्यम से किसी सामाजिक या राजनैतिक विषय पर व्यंग्य के रूप में सन्देश प्रकट किया जाता है| व्यंग्य कविता विषय के अनुसार हास्य, क्रोध या वीर रस से परिपूर्ण हो सकती हैं|

अग्रीमेंट ज़रूरी है

अग्रीमेंट ज़रूरी है vyang

मर्ज़ भले कोई हो ट्रीटमेंट ज़रूरी है जंक फ़ूड के साथ सप्लिमेंट ज़रूरी है रखिये न इसे बाँधकर ज़ोर ज़बरदस्ती से दिल की सेहत के लिए मूवमेंट ज़रूरी है खिल के हँसे मुस्कुराए तो सोचता है दिल क्या फूलों को

इस पाप की डगर पे…..!!!!

इस पाप की डगर पे.....!!!! vyang

इस पाप की डगर पर नेता दिखाओ चल के, ये देश है तुम्हारा खा जाओ इसको तल के! अच्छाइयों को रखना सदा यूँही सिराहने, दिखे जहाँ पे पैसे आ जाना उनको खाने! बदहज़मी हो न जाये खाओ पैसा संभल के!

फ़ितरत

फ़ितरत vyang

एक गिरगिट भटकते भटकते अपने साथियों से बिछुड़ एक बस्ती में आ गया हर पल, हर क्षण, मानव को रंग बदले देख सिर उसका चकरा गया, इतनी बात तो उसने जान ही ली रंग बदलने में मनुष्य ने उसे भी

कल्पना और तथ्य

कल्पना और तथ्य vyang

ये देखिये साहिब कि ज़िन्दगी कितनी उबाऊ हो गयी है बाज़ारों में इंसानों के हाथों यूँ मौत भी बिकाऊ हो गयी है, दिखाकर डर मौत का वो सभी को माल अपना बेचते हैं मर न जाए कम्बख़्त ग्राहक बेचने के

अतिश्योक्तियाँ

अतिश्योक्तियाँ vyang

मांस-मदिरा निषेध हेतु कार्यक्रम किया गया आयोजित जो कि था शहर के मदिरा-किंग के द्वारा ही प्रायोजित, मांग थी कि सभी तमोगुणी चीज़ों का उपभोग बंद करें डिसाइड हुआ कि इसी ख़ुशी में चिकन का सेवन करें, एक नेता माईक

ज्ञानधारा

ज्ञानधारा vyang

खाली काल टपाल पर श्वेतांबर सजा खड़ी-खड़ू की ये कला जाने कितनों के अरमान हैं लाखों महरूम हैं इसके एक दीदार से झोंपड़ी में कुछ पड़े दंगल में हैं कुछ मरे कुछ फुटपाथ पे झुरमुठ खड़े जो इसे है छू

लेकिन

लेकिन vyang

कितना शोर कितनी आवाज़ें हैं यहाँ, कान होकर भी जो कभी सुनाई नहीं देतीं, अजीब इत्तेफ़ाक़ है या कहो विडम्बना है, जब कभी की खुद को शांत करने की कोशिश मन को, माया को क्रोध को, सभी को बंद करने

ख़ुदगर्ज़..!!

ख़ुदगर्ज़..!! vyang

हम कितने बेदर्द हुए जा रहे हैं हम कितने बेरहम हुए जा रहे हैं, टी.वी.पर इज्ज़त लुटने की ख़बर देख थूकते हैं गाली देते हैं उन दरिंदों को, क़त्लेआम की ख़बर सुन कर मातम मनाते हैं कुछ सेकेण्ड ग़मज़दा होते

ये जनता को क्या देंगे

ये जनता को क्या देंगे vyang

भूमि सम्पदा के मालिक चेलों चमचों से घिरे हुए, आडम्बर करने वाले सिंहासन आरूढ़ गाड़ियों में चलने वाले, धन दौलत के मालिक छत्र चँवर धारण करने वाले, ये धर्म गुरू ये मठाधीश ये क्या राह दिखायेंगे, बहका कर फुसलाकर जनता

रोटी और राजनीति!!

रोटी और राजनीति!! vyang

सुबह जब निकला मैं गंतव्य को जाने के लिए, एक श्वान परिवार लगा रहा था कचरे के ढेर के आसपास चक्कर ताकि मिल जाए कुछ खाने के लिए देखा कुछ देर बाद तो माता के मुंह में था रोटी का

वो

वो vyang

जो मूक दर्शक होते हैं किसी नारी के अपमान का ; जो प्रतिकार नहीं करते कभी किसी के अत्याचार का ; जो मौन स्वीकृति देते हैं किसी के भी व्यभिचार की ; जो स्वयं तो अत्याचार सहते हैं दूसरों को