Poems classified as: हिंदी और उर्दू की कवितायें

इस संकलन में हिंदी, उर्दू और हिन्दुस्तानी में लिखी जाने वाली मूल रूप की कवितायें प्रकाशित हैं| कुछ कवि या शायर अपनी रचनाओं में बृजभाषा या पंजाबी के कुछ शब्दों का प्रयोग भी करते हैं| वे रचनाएँ भी इसी संकलन में प्रकाशित की जायेंगी| इसमें मुख्य रूप से ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई, गीत, त्रिवेणी, हाइकु, व्यंग, भजन और दोहों का चयन किया गया है|

मैं औरत हूँ

मैं औरत हूँ kavita

Photo by Biswajit Das Kunst इन्सानों की इस दुनिया में औरत हूँ मैं किसी के लिये सिर्फ़ जिस्म का टुकड़ा तो किसी की ज़िन्दगी का आधार हूँ मैं किसी ग़ैर के लिये उसकी आँखों की नुमाईश तो किसी अपने के

क्या नया लिखूँ आपके लिए

क्या नया लिखूँ आपके लिए azad nazm

क्या नया लिखूँ आपके लिए जो नहीं कहा अब तक… आज सोचा लिखूँ बहुत कुछ तभी काग़ज़ ने पूछ लिया… है कौन वह जिनके लिए शब्द ढूंढ रही है? क्या नाम है, कितना पहचानती है उसे? मुस्कुरा कर कलम उठा कर

फ़ितरत

फ़ितरत vyang

एक गिरगिट भटकते भटकते अपने साथियों से बिछुड़ एक बस्ती में आ गया हर पल, हर क्षण, मानव को रंग बदले देख सिर उसका चकरा गया, इतनी बात तो उसने जान ही ली रंग बदलने में मनुष्य ने उसे भी

आज है आपसे दूसरी मुलाक़ात

आज है आपसे दूसरी मुलाक़ात azad nazm

आज है आपसे दूसरी मुलाक़ात पहली की मैं क्या कहूँ एक दिन ढूंढ रही थी क़िताबों में एक कवि एक शायर आपकी नज़्मों पर जब अटकी नज़र मेरी गर्दिश-ए-दौर में उस झलक की मैं क्या कहूँ ख़ामोश ज़िन्दगी के अफ़सानों

ये दिल क्या है

ये दिल क्या है ghazal

हालात-ऐ-दिल न जाने क्यों मुझे मजबूर कर गया, दिल-ऐ-नाशाद मेरे ख़ुशी का पैमाना चूर कर गया| हुस्न दिया गया था तुझे दीवानगी बढ़ने को जानम, मगर ये तेरा हुस्न तुझे क्यों ज़रा मग़रूर कर गया| परवाना तेरे हुस्न का ढूँढता

मैं ख़्वाब और ख़ामोशी

मैं ख़्वाब और ख़ामोशी azad nazm

फिर वही मैं, एक ख़्वाब और कुछ ख़ामोशी एक अजनबी शाम की तरह धुंधलाता हुआ सा तुम्हारा चेहरा अपने ही टुकड़ों पर मुस्कुराता एक टूटा हुआ दिल और उसमें बिखरी पड़ी तुम्हारे हुस्न की कहानी जो मैंने अब तक गिरते

कवि

कवि azad nazm

वो जीता है काग़ज़ों में कई ज़िन्दगी हर रोज़, मगज़ से निकल पन्नों तक आते कई बिम्ब उलझ जाते हैं सुलझाता है उन्हें अँधेरे में बैठ, शब्दों से बुनकर गढ़ता है नए चित्र, टांगता है ख़यालों को सृजन की ऊँचाई

अब क्यूँ अवतार नहीं लेते

अब क्यूँ अवतार नहीं लेते kavita

जब-जब पापों का घड़ा भरा, तुमने आके संहार किया अब क्यूँ अवतार नहीं लेते, जब पापों ने सागर पार किया? ज़ुल्म हुआ है बच्चों पर, मासूमों का क़त्ल हुआ एक रावण को मारने आ गये थे तुम, यहाँ घर-घर में

बड़ी हो गई है कितनी

बड़ी हो गई है कितनी kavita

पीठ पे बस्ता टाँग के अपना हिला हाथ वो स्‍कूल चली बड़ी हो गई है अब कितनी मेरी वो नन्हीं सी कली अभी तो आई थी गोदी में अभी तो पहला कदम चली अभी तो बोली थी बस ‘मम्मी’ अपनी

इस घर का नाम न था

इस घर का नाम न था kavita

इस ऐड्रेस पर शायद अब कोई नहीं मिलता इस ऐड्रेस पर अब शायद कोई भी नहीं रहता है क्या इस घर का ठिकाना बदल गया हैं या इसके लोग? इस घर से थोड़ी सी ही दूरी के वक़्त पर रुका

संतुलित जीवन

संतुलित जीवन kavita

सोचें, आजकल त्वरित सूचनाओं की मीडिया में भरमार है जिनके आधार पर सबके बनते अलग-अलग विचार हैं, कैसी होंगीं अधिकतर सूचनाएँ यह भी सब जानते हैं स्वयं को क्या चाहिए यह भी पहचानते हैं, फिर भी उलझते हैं क्रिया व

तुझमें चाँद दिखता है

तुझमें चाँद दिखता है kavita

प्यार, मुझे शिद्दत से करो तो पहले तुम्हें मेरी तड़प का एहसास हो जायेगा, अपनी ज़िन्दगी में झाँक कर तो देखो तुम्हें मेरी अहमीयत का एहसास हो जायेगा, कहते हो प्यार तुमने हम से किया पर महसूस न कभी हमने

रण

रण kavita

इस रण के हमाम में योद्धा हर हलाल है कैसा ये कमाल है? कैसा ये तूफ़ान है? राम राज – दान राज सब बना हलाल राज हर ओर हराम राज कैसा ये टपाल है? हर खिलौना, हर कड़ी नोट हरी

परिवर्तन

परिवर्तन kavita

आज प्रात: मैं प्रथावश् था शमशान में गहरा द्वंद था प्रथा व विज्ञान में, सोचा, क्यों न प्रथा व विज्ञान का मिलन हो नव सोच का धीरे-धीरे, साथ-साथ सृजन हो, दाह-संस्कार विद्युत शव-दाह गृह में या अपनी-अपनी प्रथा अनुसार हो,

ललकार

ललकार kavita

जब अनजान शिशु ने रोकर पुकारा अपना लो मुझे मैं हूँ भूख का मारा, मेरे अंतर ने मुझे ललकारा और पूछा कहाँ है ज़मीर तुम्हारा, रोना शिशु का कष्ट का दर्पण है मुस्कुराना शिशु का खुशी का प्रदर्शन है, भले

कल्पना और तथ्य

कल्पना और तथ्य vyang

ये देखिये साहिब कि ज़िन्दगी कितनी उबाऊ हो गयी है बाज़ारों में इंसानों के हाथों यूँ मौत भी बिकाऊ हो गयी है, दिखाकर डर मौत का वो सभी को माल अपना बेचते हैं मर न जाए कम्बख़्त ग्राहक बेचने के

मेरे घर के कोने में रखी कुछ किताबें

मेरे घर के कोने में रखी कुछ किताबें azad nazm

मेरे घर के कोने में रखी कुछ किताबें सूरज की रौशनी को खुद में समाए अपने उजाले से मेरे मन के अंधेरों को चीरतीं, हवा जिन्हें जब छूकर निकले तो अपने शब्दों के कम्पन से सुनाती हैं एक गुमी हुई

कुछ तो है

कुछ तो है kavita

कुछ तो है ऐसा जो मुझे खटक रहा है फाँस बनके जो सुई सा चुभ रहा है क्यूँ हर बात पर आँखें नम हैं क्यूँ ज़िंदगी के रंग थोड़े कम हैं क्यूँ हर कोई मानो थोड़ा-थोड़ा उदास है रूठा ज़िंदगी

ज़िन्दगी किधर चली

ज़िन्दगी किधर चली kavita

सब तरफ़ ईंट पत्थर की इमारतें हैं खड़ी इन्सां की इस शहर में कमी हो चली, शोर है हर तरफ़ आवाज़ें बढ़ गईं बातों की इस शहर में कमी हो चली, चाहतों की आग में सब जल रहे ख़्वाबों से

बेअक्ल पुरखे

बेअक्ल पुरखे azad nazm

पुरखे चढ़े रहते हैं कंधों पर बेताल की तरह सदियों बाद भी, रीति रिवाज़ों और परम्पराओं के नाम पर, पर हम ढोते हैं उन्हें जन्म से लेकर मृत्यु तक, पूरी उम्र बिना सवाल के कोई दोहराते हैं वही जो पीढ़ियाँ

इंतिज़ार

इंतिज़ार kavita

वक़्त तेरा फिर से इंतिज़ार करेगा ये ज़माना तुझे हमेशा याद करेगा अभी तो तुझे नकारा है लोगों ने बेरहमी से पर आने वाले वक़्त में हर इन्सान तुझसे मिलने की फ़रियाद करेगा ये ज़मीं जिसे तूने चाहा है दिल

जननी की जननी

जननी की जननी kavita

मेरी धुंधली बचपन की यादों में तू अक्सर दिखाई देती है, उन यादों में खुले आसमान के नीचे सुनी तेरे से लोरी भी सुनाई देती है, वो लम्हे जब मेरी जननी तेरे पास छोड़ जाया करती थी, मुझे याद है

अनजाने में

अनजाने में ghazal

अनजाने में गुस्ताखियाँ कर जाती बहुत हैं तुमको देखकर धड़कन बढ़ जाती बहुत हैं हकीमों ने दवा खातिर हमारा रोग जब पूछा हम बोले कि तेरी यादें आती बहुत हैं देखकर भी ये अक्सर कर जाती हैं अनदेखा तेरी आँखें

तमन्ना

तमन्ना kavita

इल्तिजा है मेरी न कहे कोइ स्वर्गवासी मुझे इस शरीर से रुह निकल जाने के बाद, नहीं देखा है किसी ने सुने हुए स्वर्ग या नर्क को एहसास होता है इसका काफ़ी समय गुज़र जाने के बाद, स्वर्ग है इस

बारिश की वो पहली बूँद

बारिश की वो पहली बूँद kavita

उन कलियों में खिलने से जो निखार आई है उन बादलों के बरसने से जो बहार आई है यूँ लगा कि मुस्कुरा रही ज़मीं और खुशियों की बौछार आई है, उन पत्तों में बूँदों से जो चमक आई है उन मिटटी

कवि नहीं मैं

कवि नहीं मैं kavita

हूँ कवि नहीं मैं, न मुझे काव्य रस का बहुत ज्ञान है मैं तो एक अज्ञानी हूँ, अपने व्यक्तित्व पर न मुझे अभिमान है लिखना मेरा व्यापार नहीं मैं तो बस कभी कलम उठा लेता हूँ जो बात खुद से

माँ

माँ kavita

दर्द की सिसकियों में चाय की चुस्कियों में है माँ सुबह की ताज़गी में मेरी गलतियों की नाराज़गी में है माँ सावन के बहते पानी में बचपन की नादानी में है माँ हल्दी मिर्ची धनिया के रंग में परी अपसराओं

खुशियों के मायने

खुशियों के मायने kavita

खुशियों को ढूँढते हो क्यों ये खुशियाँ तो दिल में रहती हैं कभी मुस्कराहट बन जाती हैं कभी अश्क़ बन बहती हैं, ये तो बस मोहताज हैं उन चंद लफ़्ज़ों की जो दिन बना दें जिन्हें सुनते ही इंसान अपने

ख़्वाब

ख़्वाब kavita

लम्बा सफ़र, थकन ढूंढती थोड़ी सी छाँव धूप की तपिश में सुलगते से पाँव बड़े दिनों से मन को सुकून की ज़रुरत है फिर भी ज़िन्दगी कुछ तो ख़ूबसूरत है कितने जतन से चुराया एक लम्हा, समय से कि बैठ

अतिश्योक्तियाँ

अतिश्योक्तियाँ vyang

मांस-मदिरा निषेध हेतु कार्यक्रम किया गया आयोजित जो कि था शहर के मदिरा-किंग के द्वारा ही प्रायोजित, मांग थी कि सभी तमोगुणी चीज़ों का उपभोग बंद करें डिसाइड हुआ कि इसी ख़ुशी में चिकन का सेवन करें, एक नेता माईक