Poems classified as: हिंदी और उर्दू की कवितायें

इस संकलन में हिंदी, उर्दू और हिन्दुस्तानी में लिखी जाने वाली मूल रूप की कवितायें प्रकाशित हैं| कुछ कवि या शायर अपनी रचनाओं में बृजभाषा या पंजाबी के कुछ शब्दों का प्रयोग भी करते हैं| वे रचनाएँ भी इसी संकलन में प्रकाशित की जायेंगी| इसमें मुख्य रूप से ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई, गीत, त्रिवेणी, हाइकु, व्यंग, भजन और दोहों का चयन किया गया है|

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी kavita

ज़िन्दगी क्या है, एक अनबुझी पहेली सी कुछ सुलझाती, कुछ उलझाती अजीब अनकही सी, ज़िन्दगी एक धड़कन सी, कभी शोर में ख़ामोशी सी दर्द में मुस्कुराती वो मन की आॅखों से पढ़ती दर्द वो सारे, ज़िन्दगी एक समझौते सी, उठती

बस एक क़दम और

बस एक क़दम और kavita

बस एक क़दम और अब तो किनारा होगा बस एक निगाह और अब तो इशारा होगा अम्बर के नीचे, उस आशा के पीछे, कोई तो किरण होगी जीतते रहने की, कोई तो ललक होगी जो किरण को पा लिया, वो

बिना किसी मतलब के

बिना किसी मतलब के kavita

बिना किसी मतलब के वो आँख भी उठाता नहीं, बिना किसी मतलब के वो कहीं आता -जाता नहीं, तो, बिना किसी मतलब के अब कोई उसे बुलाता नहीं, बिना किसी मतलब के वो आवाज़ लगाता नहीं, बिना किसी मतलब के

हों विसंगतियाँ कितनी

हों विसंगतियाँ कितनी kavita

ऋतुओं के थपेड़े सर्दियों की सिहरन सिहर जायेगी हमारे रिश्ते की रूहानी गर्माहट निखर जायेगी क्या हुआ रहने को बसर नहीं दिल हमारे तो घर हैं इक दूजे को संभाले बसेरे की ललक बिसर जायेगी अश्क आँखों मेँ झलके बताते

शिव की काशी

शिव की काशी kavita

धवल चन्द्र के भांति धवल सुरसरि के अमि साहिल पे बसा, घाटों के नुपुर से सज्जित श्रीविश्वनाथ के रंग रचा, आरोहित हो रवि-चन्द्र जहाँ लजियाते रश्मि-ओट तले, निरखि काशि-आभामंडल “ऐसी देदीप्य भू कहाँ मिले?” जहाँ रेणु रेणु में स्वर्ग है

चिड़िया सावन वाली

चिड़िया सावन वाली kavita

एक चिड़िया सावन वाली थी वो अलबेली अटखेली सी, बूझो न कोई पहेली सी बोले जो बड़ी सयानी थी, परियों की कोई कहानी थी वो रंगों की परिभाषा थी, वो सपनों की एक आशा थी वो गोरी थी न काली,

माँडना है तो मंडन है

माँडना है तो मंडन है kavita

माँडना मंडन है गेरू गोबर से लिपी पुती सुनिश्चित ज़मीन पर कली से उतरा हुआ एक जाज्वल्यमान नक्षत्र है माँडना ही तो मंडन है रेखाओं का सुव्यवस्थित तथा सुरक्षित निश्चित संस्कारों में बंधा हुआ एक बंधन है माँडना तो मंडन

अगले जनम में

अगले जनम में kavita

अगले जनम में तुम बन जाना ख़ुशी मैं बनूँगी दुःख तब हर एक होंठ पर लाल फूल सा खिल जाना तुम मैं भी बहूँगी हर एक आँख से झरने सी अगले जनम में तुम बन जाना मिसरी मैं बनूँगी नमक

एक टूटी हुई खिड़की

एक टूटी हुई खिड़की azad nazm

एक टूटी हुई खिड़की और धूप की सलवटों में छिपी एक परछाई ढूंढती हुई भीड़ में किसी अपने को एक ख़ामोश तड़प उसे देख लेने की जो कुछ न होते हुए भी था सब कुछ वो निगाह जो मुझे तुममें

सैनिक संकल्प

सैनिक संकल्प kavita

हर पत्थर पर शौर्य कहानी लिखी होती सरहद पर देश प्राण हैं देश ही पानी देश ही रोटी सरहद पर, पीछे कदम न रखने की आदत है खोटी सरहद पर सियाचिन के जैसी भी जीती हैं चोटी सरहद पर… जो

तुम

तुम kavita

तुम वो रात हो, जिसमें जग के खोना चाहूँ वो सवेरा हो, जिसको पाना चाहूँ वो चाँद हो, जिसे हर पल देखना चाहूँ वो आसमां हो, जिसकी छाँव में रहना चाहूँ वो समुद्र हो, जिसमें डूबना चाहूँ वो वक़्त हो,

ये बात ना करो

ये बात ना करो kavita

वक़्त की नज़ाकत को समझो आलम गुज़रने की बात ना करो, क़ज़ा भी है महकी हुई अभी बहकी बहकी बातें ना करो, आग लगा दी है जो दिल में उसे बुझाने की बात ना करो, पूनम की चाँदनी खिली है

ज़माना बदल दिया

ज़माना बदल दिया kavita

रुख हवाओं का बदल दिया है कहता है इंसान मैंने ज़माना बदल दिया है, कामयाबी हासिल करने की चाहत थी छुपन छुपाई खेलती हमसे हमारी किस्मत थी, आख़िर किस्मत का पलड़ा अपनी तरफ़ किया है कहता है इंसान मैंने ज़माना

ये शहर

ये शहर azad nazm

ये शहर जो सोया हुआ है अपने ही तसव्वुर में खोया हुआ है इस शहर की ख़ामोशी का अजब अंदाज़ है यहाँ फ़िज़ाओं में बहती सपनों की आवाज़ है ये शहर जो पेड़ों से बुना हुआ है अपने जिस्म पर

कोई आने लगा मेरी यादों में

कोई आने लगा मेरी यादों में geet

कोई आने लगा मेरी यादों में मै बंधने लगा जिसके वादों में मै मांगता हूँ ख़ुशियाँ जिनकी रब से अब फ़रियादों में वो मिले तो छलकी आँखें ज्यूँ कोई बादल भादो में साँसों में वो, धड़कन में वो समायी मेरे

कैसे कहूँ

कैसे कहूँ kavita

क्या कहूँ कैसे कहूँ कहा कुछ जाता नहीं डरता है दिल यह नाराज़ न हो जाये कोई कहीं, भेजा था भगवान ने करने के लिए कुछ ख़ास कभी तो मौका मिलेगा जी रही हूँ यही ले के आस, कोई तो

इस पाप की डगर पे…..!!!!

इस पाप की डगर पे.....!!!! vyang

इस पाप की डगर पर नेता दिखाओ चल के, ये देश है तुम्हारा खा जाओ इसको तल के! अच्छाइयों को रखना सदा यूँही सिराहने, दिखे जहाँ पे पैसे आ जाना उनको खाने! बदहज़मी हो न जाये खाओ पैसा संभल के!

दूरियाँ कितनी भी हों

दूरियाँ कितनी भी हों kavita

दूरियाँ चाहे कितनी भी हों दो लफ़्ज़ ज़रूरी हैं मिटाने को यूँ ना समझो के सब कुछ खो गया हमारा देखो ज़माना बाक़ी है जीत जाने को, क्या हुआ के इस पल हार गए पूरा समा बाक़ी है जीत जाने

बेनाम रिश्ता

बेनाम रिश्ता ghazal

क़िताब को वरक-वरक होने से रोके कोई बेनाम रिश्ता ख़त्म होने से रोके कोई मुझे मेरी मोहब्बत की क़दर नहीं कुछ भी बस उस पर सितम होने से रोके काई चाहें तो आज़मा सकते दाँव-पेच हम भी पर ये गुनाह

अथ स्वागतम शुभ स्वागतम

अथ स्वागतम शुभ स्वागतम kavita

सजाया प्रकृति नटी ने साज अरे यह किसका स्वागत आज? छा रहा दिशि दिशि नव जीवन हो रहा किसका अभिनंदन? आम पीपल की बंदनवार सजी क्यों वन उपवन के द्वार? मिले फूलों को नूतन रंग पुलक से भरे अंग प्रति

लोग

लोग ghazal

जैसे कूड़े को झाड़ देते हैं लोग दुनिया उजाड़ देते हैं अच्छी खासी मेरे वतन की फ़ज़ा चार पत्थर बिगाड़ देते हैं चीर देते हैं दिल को लोग ऐसे जैसे काग़ज़ को फाड़ देते हैं क़त्ल करते हैं करने वाले

पुराने निशां

पुराने निशां kavita

कुछ निशां पुराने ज़ख्मों के उभर आये हैं आज फिर से वो ख़्वाब में नज़र आये हैं, मैं बुझ चुका हूँ जलते-जलते इक उम्र से आये तो हैं लौटकर वो देर से मगर आये हैं, कुछ निशां पुराने ज़ख्मों के

हमदम

हमदम kavita

कुछ अजनबी से लगते हैं तेरे साए आज कल तेरे अल्फ़ाज़ भी लगने लगे हैं पराए आज कल मुस्कुराहट की भी ना लगे वजह कोई तेरी ख़ामोशी भी लगने लगी है बेक़रार आज कल वो हाथ जो तेरा छूट गया

एक मासूम सी अठन्नी

एक मासूम सी अठन्नी azad nazm

एक मासूम सी अठन्नी मेरी जेब में बदमाश से रुपये से लग के गले खनकती है, इनके होने के एहसास से, मेरी जेब अब दमकती इसकी अल्हढ़ सी आहटों से, मेरी जेब कुछ मचलती है, ये मासूम क्या जाने दर्द

क़िताब

क़िताब kavita

मेरी ज़िन्दगी एक क़िताब है हर पन्ने पर एक राज़ है हर कोई इसे पढ़ना चाहता है और आता नहीं कोई बाज़ है हर पन्ने की लिखावट अलग है जो पढ़ पाया उस पर नाज़ है हर पन्ना खोलता एक

रत-मिलन

रत मिलन kavita

सितारे सिमट आए थे, दमके वफ़ा के दामन में, शब्ब-ए-शमा अल्फ़ाज़ थे, बरसे वफ़ा के आँगन में। इक झिलमिलाती रात में, थी इक हसीं क़ायनात ये, भर लें उन्हें इन बाहों में, हाय! कैसे थे जज़्बात वे? इन शबनमी दो

रुक सी गयी तक़दीर

रुक सी गयी तक़दीर kavita

रुक सी गयी तक़दीर मेरी सही वक़्त के इंतेज़ार में पता भी न चला कब आई और कब चली गयी, वक़्त नहीं ठहरा मेरे इंतेज़ार में जैसे नहीं ठहरता दरिया का पानी, बहता चला जाता है अपने बहाव में बैठा

सपना

सपना kavita

छेड़ता है वह मुझको, पता नहीं है वह कौन? आता है सपनो में मेरे, पता नहीं है वह कौन? घुमा जाता है सारी दुनिया, पता नहीं है वह कौन? बस गुज़ारिश है मेरी अल्लाह से, बता दे है वह कौन|

तोड़ दो मेरे हिंदुस्तान को

तोड़ दो मेरे हिंदुस्तान को kavita

तोड़ दो तुम मेरे हिंदुस्तान को पर कैसे छोड़ोगे अपनी पहचान को किसी को कश्मीर चाहिए, किसी को बंगाल मिल भी जाए तुम्हें एक टुकड़ा पर रह जाओगे कंगाल आज तुम देश से अलग होना चाहते हो कल क्या मोहल्ला

केसरिया ये रंग पिया

केसरिया ये रंग पिया geet

नटखट मोरे जब तो माखन खाये, माँ जसोदा का लाडला बाबा नन्द का दुलारा माँ देवकी की आँखों का तारा पिता वसुदेव का प्यारा सबको भाये, तुझ बिन मोहे कुछ नाहि भाये, तोहि प्रेम बन्सुरि जब सुनूँ तो बन्धन लाज