Poems classified as: हिंदी और उर्दू की कवितायें

इस संकलन में हिंदी, उर्दू और हिन्दुस्तानी में लिखी जाने वाली मूल रूप की कवितायें प्रकाशित हैं| कुछ कवि या शायर अपनी रचनाओं में बृजभाषा या पंजाबी के कुछ शब्दों का प्रयोग भी करते हैं| वे रचनाएँ भी इसी संकलन में प्रकाशित की जायेंगी| इसमें मुख्य रूप से ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई, गीत, त्रिवेणी, हाइकु, व्यंग, भजन और दोहों का चयन किया गया है|

घाव

घाव azad nazm

छतें ही छतें हैं बस दूर तक जहाँ नज़र हांफने लगे, दराज़ मकान ऊपर तक, जहाँ आँखें अपने ही वज़न से गिरने लगें, हवा में रखी सलीबों पर फंदों से झूलते लोग अपनी अपनी उदासी पर मुस्कानें बनाते हैं, मिटाते

नज़्म

नज़्म kavita

जाने क्यूँ भटकती सी रहती है मेरे लफ़्ज़ों में अटकती सी रहती है कभी बंद दरवाज़ों से टकराती है हवाओं में बेजान सी लहराती है कुछ हर्फ़ समेट कर ले आती है फिर खुद ही बिखर जाती है वक़्त की

अँगार ढूँढता हूँ

अँगार ढूँढता हूँ ghazal

कैसा कर्ज़दार हूँ के सूद लिए साहुकार ढूँढता हूँ, जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अँगार ढूँढता हूँ| न शहर बचा, न घर और न घर में रहने वाले, तन्हाई की धूप में सिर छुपाने को दीवार ढूँढता

शायर

शायर ghazal

जिसे जीने की चाह है, उसे शायर ना बनाओ बड़ी पेचीदा राह है, उसे शायर ना बनाओ। यादों की जमा पूँजी, पड़ी है सो रहने दो जो माज़ी से बेपरवाह है, उसे शायर ना बनाओ। नज़रों के खेल, माना दिलचस्प

मुंबई!

मुंबई! kavita

ये शहर जिसमें जान बसती है रंगबिरंगी सब आँखें हैं, जहाँ पटरियाँ हंसतीं हैं, चलता रहता है ये शहर, जहाँ तक नज़रें ले जाएँ हर तन्हा मुसाफिर को, पूरा समन्दर दे जाए, घड़ियाँ यहाँ बोलती हैं, सपनों को भाव लगाकर

याद

याद kavita

दिल में क़ैद हो तुम, आँखों पे छाई हो, ज़बां पे बैठी हो, हर बात में समाई हो, घुल रही है हर साँस तेरे नाम की खुश्बू में, मज़ा पाता है हर पल, दिल खुद से गुफ्तगु में, ये चाँदनी

चंद लम्हों को

चंद लम्हों को ghazal

चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं, बनाने वाले ग़मों को भी, खुशियाँ बना लेते हैं| न पंख बचे और अब न हौंसला उड़ने का, शाम होते ही, हम काग़ज़ पर तितलियाँ बना लेते हैं| चंद लम्हों को कई

एक-एक रुपया मेरी जेब का

एक एक रुपया मेरी जेब का ghazal

न खैरात में मिला है, न वसीयत काम आई है, एक-एक रुपया मेरी जेब का, गाढ़े पसीने की कमाई है| न शागिर्दी है मिजाज़ में, न बेपनाह हुनर है कोई, मैंने ठोकरें खा-खा कर, अपनी रह बनाई है| एक-एक रुपया

पथरीली दीवार

पथरीली दीवार kavita

मंज़िल और मेरे बीच की जो ये दीवार है मेरे हारे हुए जुनून का एक आविष्कार है क्यूँ लगता है इसकी हर एक ईंट पर लिखी मेरी हार है काँप रहा मेरा हौंसला क्यूँ लगता इतना लाचार है कभी कहकहों

इस शहर की दुकानों में

इस शहर की दुकानों में ghazal

इस शहर की दुकानों में मुझे बेच रहा है हुनर मेरा, मैं खरीद रहा हूँ अपने रास्ते और नीलाम हो रहा है सफ़र मेरा| एक शख्स मेरे अन्दर मुझे जीस्त की मजबूरियां गिनाता है, मैं ढल रहा हूँ बदलते सांचों

बारिश

बारिश kavita

हर बूँद पे तेरे आने का एहसास होता है, ऐसे मौसम में हर पल कोई दिल के पास होता है, फूल रंग वादी कोई मन को बहलाते नहीं, बहल जाने के लिए ये समां ख़ास होता है बादलों में चेहरा

बदलाव ज़रूरी है

बदलाव ज़रूरी है kavita

एक ठहराव सा महसूस होता है आज कल दिशाहीन सा लगने लगा है हर एक पल वक़्त की समझ अब घड़ी की सूई तक ही सीमित है पहर की पहचान अब सूरज की पहलों में जैसे लिप्त है ज़िंदगी के

चादर

चादर kavita

एक चादर सी ओढ़ रखी है खुद से चिपका रखी है मख्मली सपनों से बुना हुआ, आभूषणों से सजा हुआ मोह और माया की परत चढ़ाये, असंतुष्टता और प्यास को समाए पाता हूँ खुद को इस चादर की सिलवटों में

मंज़र

मंज़र kavita

सुबह की गहरी नमी है और सब धुंध लपेटे बैठे हैं, मैं दूर से देखता उनको, वो जो, शाल लपेटे बैठे हैं चेहरे के आँगन पर ढूंढें हवा बहाने बचपन के, जैसे नटखट करे शरारत, झूले अब्बा के अचकन से,

चाँद भी कोई कम शैतान नहीं

चाँद भी कोई कम शैतान नहीं azad nazm

कुछ बच्चे खेल रहे थे रात की सड़क पर तारों के कंचों से, चाँद को मार गिराने का खेल और खेल ही खेल में पता भी न चला उन्हें कि कंचों की मार से चाँद के चहरे पर पड़ गए