Poems classified as: कविता

कविता हिंदी काव्य की शैली है| कविता दो प्रकार की होती है| एक जिसमें मीटर या लय में बात की जाती है| इसमें लय का या काफिये का ख़ास ख्याल रखा जाता है| ग़ज़ल के विपरीत इसमें न्यूनतम या अधिकतम मिसरों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है| और भी कवि को कहीं पर विषय के अनुसार लय तोड़ने की अनुमति भी दी गयी है| दूसरी प्रकार की कविता नज़्म के नियम अनुसार चलती है जिसमें मीटर की कोई पाबंदी न हो| दोनों ही प्रकारों में एक ही विषय पर बात की जाती है|

ख़्वाब

ख़्वाब kavita

लम्बा सफ़र, थकन ढूंढती थोड़ी सी छाँव धूप की तपिश में सुलगते से पाँव बड़े दिनों से मन को सुकून की ज़रुरत है फिर भी ज़िन्दगी कुछ तो ख़ूबसूरत है कितने जतन से चुराया एक लम्हा, समय से कि बैठ

अब हम ही कहाँ थे

अब हम ही कहाँ थे kavita

आई जो खुशियाँ, ग़म को भुलाते रह गए दूसरों के दर्द से वाकिफ़ ही कहाँ थे आज जो आया सफ़र में, कल को ढूंढते रह गए किसी और से कदम मिलाने का होश ही कहाँ था खड़े जो हुए ठोकरों

श्री कलाम को मेरा सलाम

श्री कलाम को मेरा सलाम kavita

सुदृढ़ काया हंसमुख वादन औसत कद, ललाट पर लहराती श्वेत केश की लटें उसकी पहचान बनतीं, अचक, अचंड, अछल, अडिग, अटल अभिलाषा, अदग, अथिर, अद्वैत, अद्भुत, विलक्षण व्यक्तित्व – वह रामेश्वरम् में जन्मा, कभी इमली के बीजों को परचून की

मैं ऐसे ही ठीक हूँ

मैं ऐसे ही ठीक हूँ kavita

मैं ऐसे ही ठीक हूँ थोड़ी सी खुशी देकर फिर ग़म मेरे और बढ़ाया मत करो मेरे लब बेजान ही सही दो पल की हँसी देकर फिर मुझे और रुलाया मत करो मेरे सीने में ये खरोंचें ही ठीक हैं

खुशी की पहचान

खुशी की पहचान kavita

एक रोज़ कहूँगी कि मैं अपना अक्स जानती हूँ हाँ मैं भी अपनी हर खुशी को पहचानती हूँ एक पंछी सी आसमान में उड़ सकूँ पंख फैला मदहोश चलती पवन से मिल सकूँ एक छोटा सा मेरा भी घोसला हो

ठिठोला मन

ठिठोला मन kavita

न जाने क्या चाहे ये ठिठोला मन कभी चाहे इतना शोर हो कानों में मेरे कि खुद की आवाज़ भी न सुन पाऊँ इतनी भीड़ हो पास मेरे कि खुद के अक्स से भी न रूबरू हो पाऊँ इतनी गति

एक छोटी सी असलियत

एक छोटी सी असलियत kavita

एक इंसान की हक़ीकत क्या है ज़िन्दगी से उसे निस्बत क्या है दिल में जो हो कह नहीं पाये खुद का सच भी सह नहीं पाये पी न सके निश्छल प्याले से छल का दंश भी सह नहीं पाये हँस

एक समन्दर मेरे भीतर

एक समन्दर मेरे भीतर kavita

माना तू विशाल सही पर एक समन्दर तो मेरे भीतर भी बहता है कभी निर्मल ओस की बूँद की भांति कभी चट्टान सा जटिल दिखता है कभी चकोर सा शीतल कभी आग सा धधकता है कभी पुष्प सा सुगंधित कभी

तेरा अक्स

तेरा अक्स kavita

मेरे हाथों की लकीरों में लिखी है दास्ताँ मेरी कुछ बयान हो गयी है तो कुछ अभी बाकी है मैं अक्सर कोशिश करता हूँ इन्हें पढ़ने की चाहते हुए भी नहीं पढ़ पाता धुंधली पड़ गयी हैं लकीरें मेरी, ये

अभियंता

अभियंता kavita

अभियंता निज सृष्टि रच, धारण करें तटस्थता भोग करें सब अनवरत, कैसी है भवितव्यता, मुँह न मोड़ते फ़र्ज़ से, करें कर्म की साधना जगत देखता है नहीं अभियंता की भावना, सूर सदृश शासन मुआ, करता अनदेखी सतत अभियंता योगी सदृश,

कलाम

कलाम kavita

आज समय का पहिया घूमा, पीछे सब कुछ छूट गया एक सितारा भारत माता की आँखों का टूट गया, उसकी आँखें बंद हुईं तो पलकें कई निचोड़ गया सदियों तक न भर पायेगा, वो खालीपन छोड़ गया, न मज़हब का

चाहत

चाहत kavita

हर फ़िक्र की फ़िक्र छोड़ तेरे साथ उड़ जाना चाहती हूँ हर सोच को भुलाकर कुछ पग तेरे साथ चलना चाहती हूँ कहीं पहुँचने की हसरत नहीं बस सफ़र को जीना चाहती हूँ तेरे साथ साथ उड़कर एक अनदेखा सपना

सफ़र

सफ़र kavita

जब मेरे सफ़र पर निकलने की आहट हो तो वही चार लोग हों जिनको मेरे होने का एहसास हो जो मेरी हँसी को समझें और जिनके आँसुओं से मेरे आँसू मिलते हों जो कभी चले हों मेरे साथ साथ मेरी

जवानों के लिए

जवानों के लिए kavita

जिनके मुस्तकबिल से ये चमन हरा-भरा है जिनके ही कारण सुरक्षित ये अपनी धरा है, कारगिल के दुर्गम जगहों को बचाया देकर जान अपनी, अमर है हर जवान वो कहाँ मरा है? ख़ून की हर बूँद से सींचा है इसे

सौ बार है नमन

सौ बार है नमन kavita

एक माँ की आज फिर आँख नम हुई राखी लिए बहन की आस थम गई वक़्त की ये मांग कैसी, कैसा ये शोर है शांति बनाने के लिए युद्ध पर ही ज़ोर है सैनिक की मातृभूमि का अमन चला गया

समुन्दर की कहानी

समुन्दर की कहानी kavita

ये जो सामने है मेरे मुझे मेरा अक्स दिखता है इसमें, दूर दूर तक कोई दूसरा किनारा नहीं और बहुत कुछ समेटा है जिसने, इसकी साँसें इसकी लहरें हैं उथल पुथल जिनमें है मची कहने को तो बहुत कुछ है

कुछ लोगों को कुछ उम्मीदें हैं

कुछ लोगों को कुछ उम्मीदें हैं kavita

ख़ुदा ने दिए हैं जिस्म-ओ-जान बेशर्त मुझे मैं उस एहसान को चुकाने के लिए जिए जाता हूँ, कुछ लोगों को कुछ उम्मीदें हैं मुझसे मैं उन रिश्तों को निभाने के लिए जिए जाता हूँ, अभी भी कई चराग़ हैं बुझे

इंसानियत

इंसानियत kavita

ठहरे हूए वक़्त की दास्ताँ मैं बयान कैसे करूँ बंद हैं दरवाज़े इबादत घरों के मैं अज़ान कैसे करूँ दहशतगर्दी का आलम है हर गली हर नुक्कड़ पर सभी मज़हबों से ऊपर उठकर मैं भाईचारे का फ़रमान कैसे करूँ सुर्ख़रू

बचपन का इतवार

बचपन का इतवार kavita

आज उस बूढ़ी अलमारी के अन्दर, पुराना इतवार मिला है जाने क्या ढूँढने खोला था उन बंद दरवाज़ों को अरसा बीत गया सुने उन धुंधली आवाज़ों को, यादों के सूखे बागों में जैसे एक गुलाब खिला है आज उस बूढ़ी

हौसला

हौसला kavita

तमन्ना तो मुझे भी थी ऊँची उड़ानों की ता उम्र बस हौसला जुटाता रहा, समंदर की रेत से टीला बनाने की जब ठानी ता उम्र बस घरौंदे बनाता रहा, मिटाता रहा, रंगरेज़ बन इन्द्रधनुष से चला रंगने सब को ता

भीगी यादें

भीगी यादें kavita

कल शाम एक थी भीगी सी था धुआं धुआं सा आँखों में मैं सपने बुनने बैठी थी और फिसल गिरी कुछ यादों में कुछ यादें भुनते भुट्टों की कुछ गरम चाय के प्यालों की कुछ यादें नम लिबासों की कुछ

कशमकश

कशमकश kavita

चलते थे जिन हाथों को थामे कभी आज उन हाथों को थामने की वजह मांगते हैं डरते थे जिनके दूर हो जाने के ख़याल से आज उनके पास आने की वजह मांगते हैं क्यूँ ही मिलते हैं यूँ बिछड़ने के

आई लव यू माँ

आई लव यू माँ kavita

माँ, माँ शिद्द्त से तुमने मेरी राह देखी तो यकीनन उतनी ही ज़िद मैंने प्रभु से की कि मुझे तुम तक आना है, वो नानी अम्मा जो कहती है न “गर्भनाल का रिश्ता” – वो रिश्ता तुमसे बनाना है तुम्हारे

आतुर निगाहें

आतुर निगाहें kavita

अब गाँव के सुधन काका नहीं रहे जो मेरे घर पहुँचते ही स्कूल से आ जाया करते थे सारा काम छोड़ कर हाल चाल पूछने बैठ जाया करते थे बाबूजी की बगल में इत्मीनान से चाय की चुस्की लेते हुये

मेरे हिस्से की धूप

मेरे हिस्से की धूप kavita

मैं खुद के हिस्से की धूप मांगता हूँ कुछ और नहीं बस पल दो चार मांगता हूँ खूब जिया अब तलक साये में तेरे अब बस खुद का दीदार करना चाहता हूँ तेरे सपनों, ख़्वाहिशों के बोझ तले ढला मेरे

नींव का पत्थर

नींव का पत्थर kavita

वह है बुर्ज की शान तो क्या सब करते उनका सम्मान तो क्या शौर्य दमकता उन के दम से पौरूष की है वह मिसाल तो क्या, बाज़ारों में चर्चा है उनकी चहूँ ओर सजा दरबार तो क्या बज़्में भी सूनी

कहानी

कहानी kavita

वह अखाड़े की मिट्टी वह बादाम काजू वह दण्ड पेलते रूस्तम और राजू वह सुबह का होना या शाम ढलना दिमाग में हर वक़्त कुश्ती का होना वह गिरना उठना या दाव चलना वह प्यारी सी थपकी या नींद की

मेरे अंदर का इंसान

मेरे अंदर का इंसान kavita

उस मासूम की आँखों में भूख देखता हूँ, और उसकी ज़ुबान से निकला- “बूटपोलिश वाला” जब मेरे कानों से टकराता है मेरे अंदर का इंसान थोड़ा सा और मर जाता है, अजीब कशमकश में, खुद को तब मैं पाता हूँ

मैं तुम्हारा साया हूँ !!

मैं तुम्हारा साया हूँ !! kavita

मेरी पहचान तुम्हीं से है मेरी जान तुम्हीं से है, मेरी उत्पत्ति तुम्हीं से है और मैं तुम्हीं में समाया हूँ मैं तुम्हारा साया हूँ मैं तुम्हारा साया हूँ, ये लोगों का भ्रम है कि सूरज के उठते ही मैं

ये मुल्क मेरा!!!

ये मुल्क मेरा!!! kavita

ये क्या देखता हूँ दुनिया में तेरी कि मस्जिद भी जल रही है आज किसी मंदिर के साथ में, नाम लेकर उपरवाले का लड़ रहे हैं सब और जल रहीं हैं नफ़रत की मशालें सभी के हाथ में, नाम है