Poems classified as: कविता

कविता हिंदी काव्य की शैली है| कविता दो प्रकार की होती है| एक जिसमें मीटर या लय में बात की जाती है| इसमें लय का या काफिये का ख़ास ख्याल रखा जाता है| ग़ज़ल के विपरीत इसमें न्यूनतम या अधिकतम मिसरों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है| और भी कवि को कहीं पर विषय के अनुसार लय तोड़ने की अनुमति भी दी गयी है| दूसरी प्रकार की कविता नज़्म के नियम अनुसार चलती है जिसमें मीटर की कोई पाबंदी न हो| दोनों ही प्रकारों में एक ही विषय पर बात की जाती है|

ये बात ना करो

ये बात ना करो kavita

वक़्त की नज़ाकत को समझो आलम गुज़रने की बात ना करो, क़ज़ा भी है महकी हुई अभी बहकी बहकी बातें ना करो, आग लगा दी है जो दिल में उसे बुझाने की बात ना करो, पूनम की चाँदनी खिली है

ज़माना बदल दिया

ज़माना बदल दिया kavita

रुख हवाओं का बदल दिया है कहता है इंसान मैंने ज़माना बदल दिया है, कामयाबी हासिल करने की चाहत थी छुपन छुपाई खेलती हमसे हमारी किस्मत थी, आख़िर किस्मत का पलड़ा अपनी तरफ़ किया है कहता है इंसान मैंने ज़माना

कैसे कहूँ

कैसे कहूँ kavita

क्या कहूँ कैसे कहूँ कहा कुछ जाता नहीं डरता है दिल यह नाराज़ न हो जाये कोई कहीं, भेजा था भगवान ने करने के लिए कुछ ख़ास कभी तो मौका मिलेगा जी रही हूँ यही ले के आस, कोई तो

दूरियाँ कितनी भी हों

दूरियाँ कितनी भी हों kavita

दूरियाँ चाहे कितनी भी हों दो लफ़्ज़ ज़रूरी हैं मिटाने को यूँ ना समझो के सब कुछ खो गया हमारा देखो ज़माना बाक़ी है जीत जाने को, क्या हुआ के इस पल हार गए पूरा समा बाक़ी है जीत जाने

अथ स्वागतम शुभ स्वागतम

अथ स्वागतम शुभ स्वागतम kavita

सजाया प्रकृति नटी ने साज अरे यह किसका स्वागत आज? छा रहा दिशि दिशि नव जीवन हो रहा किसका अभिनंदन? आम पीपल की बंदनवार सजी क्यों वन उपवन के द्वार? मिले फूलों को नूतन रंग पुलक से भरे अंग प्रति

पुराने निशां

पुराने निशां kavita

कुछ निशां पुराने ज़ख्मों के उभर आये हैं आज फिर से वो ख़्वाब में नज़र आये हैं, मैं बुझ चुका हूँ जलते-जलते इक उम्र से आये तो हैं लौटकर वो देर से मगर आये हैं, कुछ निशां पुराने ज़ख्मों के

हमदम

हमदम kavita

कुछ अजनबी से लगते हैं तेरे साए आज कल तेरे अल्फ़ाज़ भी लगने लगे हैं पराए आज कल मुस्कुराहट की भी ना लगे वजह कोई तेरी ख़ामोशी भी लगने लगी है बेक़रार आज कल वो हाथ जो तेरा छूट गया

क़िताब

क़िताब kavita

मेरी ज़िन्दगी एक क़िताब है हर पन्ने पर एक राज़ है हर कोई इसे पढ़ना चाहता है और आता नहीं कोई बाज़ है हर पन्ने की लिखावट अलग है जो पढ़ पाया उस पर नाज़ है हर पन्ना खोलता एक

रत-मिलन

रत मिलन kavita

सितारे सिमट आए थे, दमके वफ़ा के दामन में, शब्ब-ए-शमा अल्फ़ाज़ थे, बरसे वफ़ा के आँगन में। इक झिलमिलाती रात में, थी इक हसीं क़ायनात ये, भर लें उन्हें इन बाहों में, हाय! कैसे थे जज़्बात वे? इन शबनमी दो

रुक सी गयी तक़दीर

रुक सी गयी तक़दीर kavita

रुक सी गयी तक़दीर मेरी सही वक़्त के इंतेज़ार में पता भी न चला कब आई और कब चली गयी, वक़्त नहीं ठहरा मेरे इंतेज़ार में जैसे नहीं ठहरता दरिया का पानी, बहता चला जाता है अपने बहाव में बैठा

सपना

सपना kavita

छेड़ता है वह मुझको, पता नहीं है वह कौन? आता है सपनो में मेरे, पता नहीं है वह कौन? घुमा जाता है सारी दुनिया, पता नहीं है वह कौन? बस गुज़ारिश है मेरी अल्लाह से, बता दे है वह कौन|

तोड़ दो मेरे हिंदुस्तान को

तोड़ दो मेरे हिंदुस्तान को kavita

तोड़ दो तुम मेरे हिंदुस्तान को पर कैसे छोड़ोगे अपनी पहचान को किसी को कश्मीर चाहिए, किसी को बंगाल मिल भी जाए तुम्हें एक टुकड़ा पर रह जाओगे कंगाल आज तुम देश से अलग होना चाहते हो कल क्या मोहल्ला

मैं औरत हूँ

मैं औरत हूँ kavita

Photo by Biswajit Das Kunst इन्सानों की इस दुनिया में औरत हूँ मैं किसी के लिये सिर्फ़ जिस्म का टुकड़ा तो किसी की ज़िन्दगी का आधार हूँ मैं किसी ग़ैर के लिये उसकी आँखों की नुमाईश तो किसी अपने के

अब क्यूँ अवतार नहीं लेते

अब क्यूँ अवतार नहीं लेते kavita

जब-जब पापों का घड़ा भरा, तुमने आके संहार किया अब क्यूँ अवतार नहीं लेते, जब पापों ने सागर पार किया? ज़ुल्म हुआ है बच्चों पर, मासूमों का क़त्ल हुआ एक रावण को मारने आ गये थे तुम, यहाँ घर-घर में

बड़ी हो गई है कितनी

बड़ी हो गई है कितनी kavita

पीठ पे बस्ता टाँग के अपना हिला हाथ वो स्‍कूल चली बड़ी हो गई है अब कितनी मेरी वो नन्हीं सी कली अभी तो आई थी गोदी में अभी तो पहला कदम चली अभी तो बोली थी बस ‘मम्मी’ अपनी

इस घर का नाम न था

इस घर का नाम न था kavita

इस ऐड्रेस पर शायद अब कोई नहीं मिलता इस ऐड्रेस पर अब शायद कोई भी नहीं रहता है क्या इस घर का ठिकाना बदल गया हैं या इसके लोग? इस घर से थोड़ी सी ही दूरी के वक़्त पर रुका

संतुलित जीवन

संतुलित जीवन kavita

सोचें, आजकल त्वरित सूचनाओं की मीडिया में भरमार है जिनके आधार पर सबके बनते अलग-अलग विचार हैं, कैसी होंगीं अधिकतर सूचनाएँ यह भी सब जानते हैं स्वयं को क्या चाहिए यह भी पहचानते हैं, फिर भी उलझते हैं क्रिया व

तुझमें चाँद दिखता है

तुझमें चाँद दिखता है kavita

प्यार, मुझे शिद्दत से करो तो पहले तुम्हें मेरी तड़प का एहसास हो जायेगा, अपनी ज़िन्दगी में झाँक कर तो देखो तुम्हें मेरी अहमीयत का एहसास हो जायेगा, कहते हो प्यार तुमने हम से किया पर महसूस न कभी हमने

रण

रण kavita

इस रण के हमाम में योद्धा हर हलाल है कैसा ये कमाल है? कैसा ये तूफ़ान है? राम राज – दान राज सब बना हलाल राज हर ओर हराम राज कैसा ये टपाल है? हर खिलौना, हर कड़ी नोट हरी

परिवर्तन

परिवर्तन kavita

आज प्रात: मैं प्रथावश् था शमशान में गहरा द्वंद था प्रथा व विज्ञान में, सोचा, क्यों न प्रथा व विज्ञान का मिलन हो नव सोच का धीरे-धीरे, साथ-साथ सृजन हो, दाह-संस्कार विद्युत शव-दाह गृह में या अपनी-अपनी प्रथा अनुसार हो,

ललकार

ललकार kavita

जब अनजान शिशु ने रोकर पुकारा अपना लो मुझे मैं हूँ भूख का मारा, मेरे अंतर ने मुझे ललकारा और पूछा कहाँ है ज़मीर तुम्हारा, रोना शिशु का कष्ट का दर्पण है मुस्कुराना शिशु का खुशी का प्रदर्शन है, भले

कुछ तो है

कुछ तो है kavita

कुछ तो है ऐसा जो मुझे खटक रहा है फाँस बनके जो सुई सा चुभ रहा है क्यूँ हर बात पर आँखें नम हैं क्यूँ ज़िंदगी के रंग थोड़े कम हैं क्यूँ हर कोई मानो थोड़ा-थोड़ा उदास है रूठा ज़िंदगी

ज़िन्दगी किधर चली

ज़िन्दगी किधर चली kavita

सब तरफ़ ईंट पत्थर की इमारतें हैं खड़ी इन्सां की इस शहर में कमी हो चली, शोर है हर तरफ़ आवाज़ें बढ़ गईं बातों की इस शहर में कमी हो चली, चाहतों की आग में सब जल रहे ख़्वाबों से

इंतिज़ार

इंतिज़ार kavita

वक़्त तेरा फिर से इंतिज़ार करेगा ये ज़माना तुझे हमेशा याद करेगा अभी तो तुझे नकारा है लोगों ने बेरहमी से पर आने वाले वक़्त में हर इन्सान तुझसे मिलने की फ़रियाद करेगा ये ज़मीं जिसे तूने चाहा है दिल

जननी की जननी

जननी की जननी kavita

मेरी धुंधली बचपन की यादों में तू अक्सर दिखाई देती है, उन यादों में खुले आसमान के नीचे सुनी तेरे से लोरी भी सुनाई देती है, वो लम्हे जब मेरी जननी तेरे पास छोड़ जाया करती थी, मुझे याद है

तमन्ना

तमन्ना kavita

इल्तिजा है मेरी न कहे कोइ स्वर्गवासी मुझे इस शरीर से रुह निकल जाने के बाद, नहीं देखा है किसी ने सुने हुए स्वर्ग या नर्क को एहसास होता है इसका काफ़ी समय गुज़र जाने के बाद, स्वर्ग है इस

बारिश की वो पहली बूँद

बारिश की वो पहली बूँद kavita

उन कलियों में खिलने से जो निखार आई है उन बादलों के बरसने से जो बहार आई है यूँ लगा कि मुस्कुरा रही ज़मीं और खुशियों की बौछार आई है, उन पत्तों में बूँदों से जो चमक आई है उन मिटटी

कवि नहीं मैं

कवि नहीं मैं kavita

हूँ कवि नहीं मैं, न मुझे काव्य रस का बहुत ज्ञान है मैं तो एक अज्ञानी हूँ, अपने व्यक्तित्व पर न मुझे अभिमान है लिखना मेरा व्यापार नहीं मैं तो बस कभी कलम उठा लेता हूँ जो बात खुद से

माँ

माँ kavita

दर्द की सिसकियों में चाय की चुस्कियों में है माँ सुबह की ताज़गी में मेरी गलतियों की नाराज़गी में है माँ सावन के बहते पानी में बचपन की नादानी में है माँ हल्दी मिर्ची धनिया के रंग में परी अपसराओं

खुशियों के मायने

खुशियों के मायने kavita

खुशियों को ढूँढते हो क्यों ये खुशियाँ तो दिल में रहती हैं कभी मुस्कराहट बन जाती हैं कभी अश्क़ बन बहती हैं, ये तो बस मोहताज हैं उन चंद लफ़्ज़ों की जो दिन बना दें जिन्हें सुनते ही इंसान अपने