Poems classified as: कविता

कविता हिंदी काव्य की शैली है| कविता दो प्रकार की होती है| एक जिसमें मीटर या लय में बात की जाती है| इसमें लय का या काफिये का ख़ास ख्याल रखा जाता है| ग़ज़ल के विपरीत इसमें न्यूनतम या अधिकतम मिसरों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है| और भी कवि को कहीं पर विषय के अनुसार लय तोड़ने की अनुमति भी दी गयी है| दूसरी प्रकार की कविता नज़्म के नियम अनुसार चलती है जिसमें मीटर की कोई पाबंदी न हो| दोनों ही प्रकारों में एक ही विषय पर बात की जाती है|

जुदाई

जुदाई kavita

यूँ तो हो रहे हैं हम जुदा इस पल, इस वक़्त यहाँ, पर एक एक साँस मेरे इस जनम की, तुम्हारे साथ होगी, यूँ तो खुश है ये दुनिया, के तन्हा हैं एक द्सरे के बिना हम, अगर साथ साथ

उम्मीद

उम्मीद kavita

चलो मौसम को चिठ्ठी लिखें और इंतज़ार करें जवाब का जैसे नादान बच्चा कोई रेत के घर बना कर राह देखता है लहरों की, चलो जज़्बात निचोड़ कर टांग दें रस्सी पर तानों से कसी च्यूँटी से बाँध दें और

संतुलन

संतुलन kavita

मेरे नगर में मर रहे हैं पूर्वज ख़त्म हो रही हैं स्मृतियाँ अदृश्य सम्वाद ! किसी की नहीं याद – हम ग़ुलाम अच्छे थे या आज़ाद ? बहुत ऊँचाई से गिरो और लगातार गिरते रहो तो उड़ने जैसा लगता है

ज़िंदगी बाकी है!

ज़िंदगी बाकी है! kavita

ज़िंदगी की एक तलाश अब भी बाकी है … मेरे घर के कबाड़ से चिरागों की पोटली मिलना अब भी बाकी है उस चमकते क्षितिज को देख पाने की तलब अब भी बाकी है, चल! अब तो कदमों में कांटों

नन्हे तुम्हारे मन में

नन्हे तुम्हारे मन में kavita

नन्हे तुम्हारे मन में यह कैसे विचार आते हैं मधुर तुम्हारे चंचल सवालों को जैसे पर लग जाते हैं मुस्कुरा कर रह जाता हूँ तुम्हारी चंचलता के वार से खूबसूरत अपनी पहेलियों में उलझा देती हो बड़े प्यार से कभी

घर

घर kavita

एक कदम पीछे हटते ही हो जाती हो क़ैद उसी सुनहरे पिंजरे में । एक कदम बढ़ाने पर ही बाहर हो जाती हो ? समाज के दायरों से दूर बहुत दूर । क्या तुम्हारे घर में आँगन नहीं है ?

बच्चा

बच्चा kavita

माँ चाहती है बच्चा डॉक्टर बने । पापा चाहते हैं बच्चा इंजीनियर बने । बच्चा चाहता है थोड़ी देर और बारिश में भीगना । दुनिया भर के तमाम डॉक्टर इंजीनियर के सपनों में बच्चा थोड़ी देर और खेलना चाहता है

जूते

जूते kavita

इन भूरे जूतों ने तय किए हैं कितने ही सफ़र ! चक्खा है इन्होंने समुद्र का खारापन थिरके हैं ये पहाड़ी लोकगीत पर और फिसले हैं बर्फ की ढलान पर मेरे संग । इन्होंने सहर्ष पिया है मेरे पैरों का

सौ बरस

सौ बरस kavita

कुछ सौ बरस पहले का किस्सा है, कुछ सौ रोज़ का एक इश्क़ चला था; छुप छुप के मिलते थे दोनों पागल से, साथ जीने का एक ख्वाब पला था! फिर कितना ही छुपाया दोनों ने, एक रोज़ उनका किस्सा

अपना शहर

अपना शहर kavita

जो खुश्बू छोड़ गई थी यहाँ आज फिर से उसने मुझे घेरा है सड़कों पर चहरे रौशन हैं इतने चाँद की ऊंगली थामे सवेरा है| क़दमों पर पंख लगाकर ख़याल बेख़ौफ़ भागते है सपने भी यहाँ आँखें खोल रात रात

ख़ामोशी की ज़ुबां

ख़ामोशी की ज़ुबां kavita

घर के दरवाज़े पर ठहरा हुआ, तेरी आहट का साया है कच्ची नींद से अक्सर रात में, इसने हमें जगाया है खिड़की के उस शीशे पर, आज भी तेरी सांसें जमी हैं ये वहम है हमारा या महज़, तेरी कमी

कविता

कविता kavita

एक कविता लिखी है तुम पर तुम्हें कैसे सुनाऊं? तुम्हारे आते ही धडकनें तेज़ हो जाती हैं इस दिल को कैसे समझाऊं? तुम्हें देख के खिल उठता है मन, क्या करूँ? आँखों में क़ैद है तस्वीर तुम्हारी उस तस्वीर को

एक आईना जो बोलता है

एक आईना जो बोलता है kavita

घर के एक कोने में बैठा, निगाहों में वही तीर लिए, यार जो यारी तोलता है, एक आईना जो बोलता है| हर दिन मैं बदल गया, हर हाल में वो ढल गया, वो खुदा की तरह बुलंद है, न हँसता

नज़्म

नज़्म kavita

जाने क्यूँ भटकती सी रहती है मेरे लफ़्ज़ों में अटकती सी रहती है कभी बंद दरवाज़ों से टकराती है हवाओं में बेजान सी लहराती है कुछ हर्फ़ समेट कर ले आती है फिर खुद ही बिखर जाती है वक़्त की

मुंबई!

मुंबई! kavita

ये शहर जिसमें जान बसती है रंगबिरंगी सब आँखें हैं, जहाँ पटरियाँ हंसतीं हैं, चलता रहता है ये शहर, जहाँ तक नज़रें ले जाएँ हर तन्हा मुसाफिर को, पूरा समन्दर दे जाए, घड़ियाँ यहाँ बोलती हैं, सपनों को भाव लगाकर

याद

याद kavita

दिल में क़ैद हो तुम, आँखों पे छाई हो, ज़बां पे बैठी हो, हर बात में समाई हो, घुल रही है हर साँस तेरे नाम की खुश्बू में, मज़ा पाता है हर पल, दिल खुद से गुफ्तगु में, ये चाँदनी

पथरीली दीवार

पथरीली दीवार kavita

मंज़िल और मेरे बीच की जो ये दीवार है मेरे हारे हुए जुनून का एक आविष्कार है क्यूँ लगता है इसकी हर एक ईंट पर लिखी मेरी हार है काँप रहा मेरा हौंसला क्यूँ लगता इतना लाचार है कभी कहकहों

बारिश

बारिश kavita

हर बूँद पे तेरे आने का एहसास होता है, ऐसे मौसम में हर पल कोई दिल के पास होता है, फूल रंग वादी कोई मन को बहलाते नहीं, बहल जाने के लिए ये समां ख़ास होता है बादलों में चेहरा

बदलाव ज़रूरी है

बदलाव ज़रूरी है kavita

एक ठहराव सा महसूस होता है आज कल दिशाहीन सा लगने लगा है हर एक पल वक़्त की समझ अब घड़ी की सूई तक ही सीमित है पहर की पहचान अब सूरज की पहलों में जैसे लिप्त है ज़िंदगी के

चादर

चादर kavita

एक चादर सी ओढ़ रखी है खुद से चिपका रखी है मख्मली सपनों से बुना हुआ, आभूषणों से सजा हुआ मोह और माया की परत चढ़ाये, असंतुष्टता और प्यास को समाए पाता हूँ खुद को इस चादर की सिलवटों में

मंज़र

मंज़र kavita

सुबह की गहरी नमी है और सब धुंध लपेटे बैठे हैं, मैं दूर से देखता उनको, वो जो, शाल लपेटे बैठे हैं चेहरे के आँगन पर ढूंढें हवा बहाने बचपन के, जैसे नटखट करे शरारत, झूले अब्बा के अचकन से,