Poems classified as: कविता

कविता हिंदी काव्य की शैली है| कविता दो प्रकार की होती है| एक जिसमें मीटर या लय में बात की जाती है| इसमें लय का या काफिये का ख़ास ख्याल रखा जाता है| ग़ज़ल के विपरीत इसमें न्यूनतम या अधिकतम मिसरों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है| और भी कवि को कहीं पर विषय के अनुसार लय तोड़ने की अनुमति भी दी गयी है| दूसरी प्रकार की कविता नज़्म के नियम अनुसार चलती है जिसमें मीटर की कोई पाबंदी न हो| दोनों ही प्रकारों में एक ही विषय पर बात की जाती है|

आईना ए जहां

आईना ए जहां kavita

सबने जिसको धूप कहा, हमें वही सूरज का नूर लगा पसीने की रोशनाई* से नसीब के हिस्से लिखे हमने कई दुश्वारियाँ अपने हिस्से हमने अपने आप लिखीं उसूल-ओ-ईमान पे चलने के कड़वे घूँट ख़ूब चखे हमने बदलते वक़्त पे ग़ैरों

फ़लसफ़ा ए आदमी

फ़लसफ़ा ए आदमी kavita

विसाल-ए-महबूब तो शानों पे सर फ़िराक़-ए-महबूब तो ज़ानू पे सर बग़लगीर महबूब तो हसीन तन्हाइयाँ फ़िराक़-ए-महबूब तो खूँखार तन्हाइयाँ ख़ुमार-ए-कामयाबी तो मैक़दे दुश्वार-ए-हालात तो सनमक़दे बोसा-ए-कामयाबी तो मेरी तदबीरें गर्दिश-ए-दौरां तो अपनी फूटी तकदीरें शोहरतें दौलतें तो यार हम-प्याले खाली

हक़ीकत-ए-ज़िन्दगी

हक़ीकत ए ज़िन्दगी kavita

लम्हे बुरे वक़्त के बड़े ही काम के निकले मेरी आस्तीनों में से कई अज़ीज़ साँप निकले, दुनिया वाले जिस पे आँखें मूँद के गुज़रे हम उस रह गुज़र पे भूल से भी नहीं निकले, रंग -रूप, पैराहन पे ही

ख़्वाहिशें

ख़्वाहिशें kavita

आज फिर माँ की यादों ने घेर लिया, जी चाहा मैं फिर से शरीर* हो जाऊँ तू मुझसे मिलने का मन बना तो सही, तेरे लिए मैं ख़ुद ही रास्ता हो जाऊँ हवस-ए-बदन को उल्फ़त बताने वालों, जी में आता

भेद

भेद kavita

न बात हुई न अश्क छुपा, न याद गई न शख्स रुका, न ढुलका आँसू का कतरा, न ही दरिया में सीप मिला, न रुका शंख का नाद यहाँ, न युद्ध रुका न प्रेम दिखा, न सूरज डूबा पश्चिम में,

मेरे विचार मेरे हमसफ़र

मेरे विचार मेरे हमसफ़र kavita

अभी निकला हूँ बड़ी उम्मीद से कि राहें गुलबदन सी रौशन होंगी, उस कुम्हार से हर रोज़ इक ख़्वाहिश लिये चलता हूँ । यूँ ही न भटकता रहूँ मैं इस अपार चराचर में, मंज़िलों का सपना लिए मैं रोज़ भटकता

बुढ़ापा

बुढ़ापा kavita

Photo by VinothChandar उम्र की हर ऋतु का बन जाए जो समागम, ऐसी सोंधी ख़ुश्बू सा होता बुढ़ापे का मौसम, जीवन की राहों में बेनाम हुए जो अरमान, बुढ़ापे के अंशुल ने दी उन्हे हसीन उड़ान, चाहतों के लेकर पंख

गौरय्या

गौरय्या kavita

लो फिर आ धमकी वह नन्हीं गौरय्या चोंच में दबाये एक छोटा सा तिनका निःशंक जैसे हो उसका ही घर यह घोंसला बनाने का कर के इरादा कैसी भोली, नासमझ है गौरय्या! समझाया था उसको अनेक बार मैंने सुरक्षित नहीं

नदी

नदी kavita

नदी को बहने दो बहती रहने दो उसे बांधो मत उसकी उन्मुक्त जलधार को अपनी स्वार्थ सिद्धि के निमित्त बहने दो उसे अविराम, अविकल क्योंकि अनंत अवरोधों के बीच भी निरंतर प्रवाहमान रहना ही तो है उसकी प्रकृति और नियति

यात्रा

यात्रा kavita

दिन चढ़ेगा आज सूरज भी निकलेगा लेकिन, थोड़ी सी ठंडक होगी फ़िज़ाओं में और साथ घुलेगी कुछ महक भी मद्धम सी, इन हवाओं के रस्ते होंगे नदियाँ होंगी, धाराओं को चीरकर बांधों के ऊपर से निकलकर हवाएँ चलेंगी ऐसे जैसे

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी kavita

ज़िन्दगी क्या है, एक अनबुझी पहेली सी कुछ सुलझाती, कुछ उलझाती अजीब अनकही सी, ज़िन्दगी एक धड़कन सी, कभी शोर में ख़ामोशी सी दर्द में मुस्कुराती वो मन की आॅखों से पढ़ती दर्द वो सारे, ज़िन्दगी एक समझौते सी, उठती

बस एक क़दम और

बस एक क़दम और kavita

बस एक क़दम और अब तो किनारा होगा बस एक निगाह और अब तो इशारा होगा अम्बर के नीचे, उस आशा के पीछे, कोई तो किरण होगी जीतते रहने की, कोई तो ललक होगी जो किरण को पा लिया, वो

बिना किसी मतलब के

बिना किसी मतलब के kavita

बिना किसी मतलब के वो आँख भी उठाता नहीं, बिना किसी मतलब के वो कहीं आता -जाता नहीं, तो, बिना किसी मतलब के अब कोई उसे बुलाता नहीं, बिना किसी मतलब के वो आवाज़ लगाता नहीं, बिना किसी मतलब के

हों विसंगतियाँ कितनी

हों विसंगतियाँ कितनी kavita

ऋतुओं के थपेड़े सर्दियों की सिहरन सिहर जायेगी हमारे रिश्ते की रूहानी गर्माहट निखर जायेगी क्या हुआ रहने को बसर नहीं दिल हमारे तो घर हैं इक दूजे को संभाले बसेरे की ललक बिसर जायेगी अश्क आँखों मेँ झलके बताते

शिव की काशी

शिव की काशी kavita

धवल चन्द्र के भांति धवल सुरसरि के अमि साहिल पे बसा, घाटों के नुपुर से सज्जित श्रीविश्वनाथ के रंग रचा, आरोहित हो रवि-चन्द्र जहाँ लजियाते रश्मि-ओट तले, निरखि काशि-आभामंडल “ऐसी देदीप्य भू कहाँ मिले?” जहाँ रेणु रेणु में स्वर्ग है

चिड़िया सावन वाली

चिड़िया सावन वाली kavita

एक चिड़िया सावन वाली थी वो अलबेली अटखेली सी, बूझो न कोई पहेली सी बोले जो बड़ी सयानी थी, परियों की कोई कहानी थी वो रंगों की परिभाषा थी, वो सपनों की एक आशा थी वो गोरी थी न काली,

माँडना है तो मंडन है

माँडना है तो मंडन है kavita

माँडना मंडन है गेरू गोबर से लिपी पुती सुनिश्चित ज़मीन पर कली से उतरा हुआ एक जाज्वल्यमान नक्षत्र है माँडना ही तो मंडन है रेखाओं का सुव्यवस्थित तथा सुरक्षित निश्चित संस्कारों में बंधा हुआ एक बंधन है माँडना तो मंडन

अगले जनम में

अगले जनम में kavita

अगले जनम में तुम बन जाना ख़ुशी मैं बनूँगी दुःख तब हर एक होंठ पर लाल फूल सा खिल जाना तुम मैं भी बहूँगी हर एक आँख से झरने सी अगले जनम में तुम बन जाना मिसरी मैं बनूँगी नमक

सैनिक संकल्प

सैनिक संकल्प kavita

हर पत्थर पर शौर्य कहानी लिखी होती सरहद पर देश प्राण हैं देश ही पानी देश ही रोटी सरहद पर, पीछे कदम न रखने की आदत है खोटी सरहद पर सियाचिन के जैसी भी जीती हैं चोटी सरहद पर… जो

तुम

तुम kavita

तुम वो रात हो, जिसमें जग के खोना चाहूँ वो सवेरा हो, जिसको पाना चाहूँ वो चाँद हो, जिसे हर पल देखना चाहूँ वो आसमां हो, जिसकी छाँव में रहना चाहूँ वो समुद्र हो, जिसमें डूबना चाहूँ वो वक़्त हो,

ये बात ना करो

ये बात ना करो kavita

वक़्त की नज़ाकत को समझो आलम गुज़रने की बात ना करो, क़ज़ा भी है महकी हुई अभी बहकी बहकी बातें ना करो, आग लगा दी है जो दिल में उसे बुझाने की बात ना करो, पूनम की चाँदनी खिली है

ज़माना बदल दिया

ज़माना बदल दिया kavita

रुख हवाओं का बदल दिया है कहता है इंसान मैंने ज़माना बदल दिया है, कामयाबी हासिल करने की चाहत थी छुपन छुपाई खेलती हमसे हमारी किस्मत थी, आख़िर किस्मत का पलड़ा अपनी तरफ़ किया है कहता है इंसान मैंने ज़माना

कैसे कहूँ

कैसे कहूँ kavita

क्या कहूँ कैसे कहूँ कहा कुछ जाता नहीं डरता है दिल यह नाराज़ न हो जाये कोई कहीं, भेजा था भगवान ने करने के लिए कुछ ख़ास कभी तो मौका मिलेगा जी रही हूँ यही ले के आस, कोई तो

दूरियाँ कितनी भी हों

दूरियाँ कितनी भी हों kavita

दूरियाँ चाहे कितनी भी हों दो लफ़्ज़ ज़रूरी हैं मिटाने को यूँ ना समझो के सब कुछ खो गया हमारा देखो ज़माना बाक़ी है जीत जाने को, क्या हुआ के इस पल हार गए पूरा समा बाक़ी है जीत जाने

अथ स्वागतम शुभ स्वागतम

अथ स्वागतम शुभ स्वागतम kavita

सजाया प्रकृति नटी ने साज अरे यह किसका स्वागत आज? छा रहा दिशि दिशि नव जीवन हो रहा किसका अभिनंदन? आम पीपल की बंदनवार सजी क्यों वन उपवन के द्वार? मिले फूलों को नूतन रंग पुलक से भरे अंग प्रति

पुराने निशां

पुराने निशां kavita

कुछ निशां पुराने ज़ख्मों के उभर आये हैं आज फिर से वो ख़्वाब में नज़र आये हैं, मैं बुझ चुका हूँ जलते-जलते इक उम्र से आये तो हैं लौटकर वो देर से मगर आये हैं, कुछ निशां पुराने ज़ख्मों के

हमदम

हमदम kavita

कुछ अजनबी से लगते हैं तेरे साए आज कल तेरे अल्फ़ाज़ भी लगने लगे हैं पराए आज कल मुस्कुराहट की भी ना लगे वजह कोई तेरी ख़ामोशी भी लगने लगी है बेक़रार आज कल वो हाथ जो तेरा छूट गया

क़िताब

क़िताब kavita

मेरी ज़िन्दगी एक क़िताब है हर पन्ने पर एक राज़ है हर कोई इसे पढ़ना चाहता है और आता नहीं कोई बाज़ है हर पन्ने की लिखावट अलग है जो पढ़ पाया उस पर नाज़ है हर पन्ना खोलता एक

रत-मिलन

रत मिलन kavita

सितारे सिमट आए थे, दमके वफ़ा के दामन में, शब्ब-ए-शमा अल्फ़ाज़ थे, बरसे वफ़ा के आँगन में। इक झिलमिलाती रात में, थी इक हसीं क़ायनात ये, भर लें उन्हें इन बाहों में, हाय! कैसे थे जज़्बात वे? इन शबनमी दो

रुक सी गयी तक़दीर

रुक सी गयी तक़दीर kavita

रुक सी गयी तक़दीर मेरी सही वक़्त के इंतेज़ार में पता भी न चला कब आई और कब चली गयी, वक़्त नहीं ठहरा मेरे इंतेज़ार में जैसे नहीं ठहरता दरिया का पानी, बहता चला जाता है अपने बहाव में बैठा