Poems classified as: ग़ज़ल

ये उर्दू शायरी का सबसे पहला और सबसे नियंत्रित रूप है| इसमें हर मिसरे को एक लय में या मीटर में कहा जाता है जो इसे अपने आप में ख़ूबसूरत और मुश्किल भी बनाता है| इस शैली में एक ही विचार पर बात की जाती है मगर इसे सीधे सीधे बयान नहीं किया जाता| ग़ज़ल के कोई दो शेर ऊपरी तौर पर एक दुसरे से मुख्तलिफ हो सकते हैं पर उनके विचार लगभग एक ही होंगे या आलंकृत होंगे| एक ग़ज़ल में कम से कम 5 शेर होना ज़रूरी है| हालांकि पुराने नियम के मुताबिक हद से हद सिर्फ 25 शेर ही हो सकते हैं लेकिन नए दौर में अधिकतम शेरों पर कोई पाबंदी नहीं लगाई जाती है|

तेरी याद

तेरी याद ghazal

है रात जवाँ दर्द का दरमाँ है तेरी याद सद शुक्र कि नज़दीक ए राग ए जाँ है तेरी याद, ऐ वहशिये आहू सिफ़त अब लौट के आजा अब हद है कि अब मुझसे गुरेज़ाँ है तेरी याद, तू रब

आग

आग ghazal

हर दिल में आग शहर है सहरा है आग में इतनी बढ़ी है आग कि दरिया है आग में ये आज किसने आग के मानी बदल दिए ये आज किसने फूल खिलाया है आग में हँसते हैं देख देख के

ग़ज़ल

ग़ज़ल ghazal

ख़ुशामद करके वो पहरों कभी मुझको मनाता है उसे मेरी तरह से चाहने का ढंग आता है, जहान-ए-हुस्न की रानाईयों में शौक़ का आलम शरारत जब भी दिल करता है दिलबर मुस्कुराता है, बसद लुत्फ़-ओ-करम लेकर मुझे जाता है दरिया

आता नहीं मुझे

आता नहीं मुझे ghazal

मुमकिन को नामुमकिन कह पाना आता नहीं मुझे, सच को झूठ, झूठ को सच दिखलाना आता नहीं मुझे| कद्र नहीं जिन्हें मेरे दिल के अरमानों की, उन्हें दिल से अपना मान पाना आता नहीं मुझे| तल्ख़ लफ़्ज़ हैं जिनके तौहीन

मैं न कोई मसीहा न कोई रहनुमा हूँ

मैं न कोई मसीहा न कोई रहनुमा हूँ ghazal

मैं न कोई मसीहा, न कोई रहनुमा हूँ, मैं अपनी आग हूँ, मैं अपना ही धुंआ हूँ। मुझे परखने वाले शायद ये नहीं जानते, मैं अपना गुनाह हूँ, मैं अपनी ही सज़ा हूँ। हर बार नाकाम हुई है साजिश दुनिया

कुछ डरा हुआ सा दिल

कुछ डरा हुआ सा दिल ghazal

कुछ डरा हुआ सा दिल, थोड़ा परेशान है, अब ये मौसम चंद दिनों का मेहमान है। कुछ ज़माने को भी हैं हमसे ग़लतफ़हमियाँ, कुछ हमें भी अपनी शख्सियत का गुमान है। तिनके सा बह निकला हूँ दरिया के साथ, जो

कोई समंदर ढूंढो

कोई समंदर ढूंढो ghazal

दरिया तो बस घुटनों तक आता है, अब डूबने के लिए कोई समंदर ढूंढो । एक अरसा हुआ दिल की जागीर लुटे, अब यहाँ हवेली नहीं, कोई खंडर ढूंढो। इन भागते रास्तों पर नहीं मिलेगा, सवाल का जवाब अपने अंदर

सीखो

सीखो ghazal

बहुत भाग लिये, अब रुकना सीखो, अदब सीखो, अदब से झुकना सीखो। रास्ते खुदबखुद बन जायेंगे चलते चलते, तुम गिरना सीखो गिरकर उठना सीखो। सुखनवरी भी आ जायेगी धीरे धीरे, पहले तुम ईमानदारी से लिखना सीखो। बाज़ार ए उल्फ़त ने

बदल डालो!

बदल डालो! ghazal

सिर्फ़ पन्ना ही क्यों, पूरी किताब बदल डालो, बासे हुए हैं जो ख़्वाब, वो ख़्वाब बदल डालो ज़िंदगी के पास न जाने कितने ही सुरूर हैं, जब ज़ायका ज़ुबां चढ़े, शराब बदल डालो ये नादानियाँ तुम भी कर लो सांस रहते,

कसूर ये है

कसूर ये है ghazal

कसूर ये है के तू हर वक़्त मयस्सर है, जिन्हें देखनी है दुनिया उनका तू घर है आना और जाना फ़ितरत-ओ-मजबूरी है, कहीं को न जाता हुआ, ये कैसा सफ़र है तुम से ज़्यादा अज़ीज़ मंज़िल कभी न थी, बात

शिकायत

शिकायत ghazal

हर फ़ल्सफ़े का ज़ौक़ नया होता है, तुझसे मुलाक़ात का शौक़ नया होता है। दूर आँधी में है गिरफ़्तार मेरी किश्ती, फिर भी साहिल पे उतरने का अंदाज़ नया होता है। मैं तो मिलता हूँ अमीरों से, ग़रीबों से यकसाँ,

क़त्ल कर के…

क़त्ल कर के... ghazal

क़त्ल कर के मेरे क़ातिल ने कहा तुम्हें क्या हुआ, तुम्हें किसने मारा है I ग़ैर का बोसा है अगर तुम्हारी जीत का निशां “मेघ” जानता है के वो, इसी में हारा है I तुम क्या समझाओगे उसको असरार-ए-हक़ीकत वो

मेरी ज़िन्दगी…

मेरी ज़िन्दगी... ghazal

मेरी ज़िन्दगी किसी कहानी की तरह कोई पढ़ता रहा कोई सुनाता रहा I उसकी मांग में अब ग़ैर का निशां है मैं देखता रहा वो दिखाता रहा I दौलत-ए-दुनिया का ये निज़ाम देख कोई लुटता रहा कोई लुटाता रहा I

मेरी मोहब्बत का…

मेरी मोहब्बत का... ghazal

मेरी मोहब्बत का इतना सा फ़साना है उम्र दरिया-ए-ग़म है और इंतिज़ार पैमाना है I रोज़ मिलते हैं बिछड़ने के लिए या रब तू बता ये कैसा फ़साना है I चाँद बनने की तुझे ख़्वाहिश मुझे आफ़्ताब की ये तेरा आना

दिल के रिश्ते…

दिल के रिश्ते... ghazal

दिल के रिश्ते अजीब होते हैं वो जितना दूर जाते हैं और क़रीब होते हैं I जब भी मैंने पूछा उनके दिल का हाल क्यों, किस लिए बस सवाल यही होते हैं I मैं ये कैसे बताऊँ वो कौन है

तारीफ़

तारीफ़ ghazal

रिश्ता तोड़ कर मुझसे, जो मेरी तारीफ़ करता है वो अक्सर कहता था मरे की निंदा नहीं करते कई अफ़साने दफ़न हैं, गई रातों के मज़ारों पर नए शेर सुना कर सजदे में, उन्हें ज़िन्दा नहीं करते तेरा ऐतबार करना,

कुछ ख़्वाब

कुछ ख़्वाब ghazal

कुछ ख़्वाब न देखें तो गुज़ारा नहीं होता, जो हमारा है हक़ीकत में.. हमारा नहीं होता| गर उसकी नज़र से मेरी नज़र मिल जाए, दुनिया में इससे खूबसूरत नज़ारा नहीं होता| कुछ ख़्वाब न देखें तो गुज़ारा नहीं होता… तुम

हर शख्स के हाथ में कटोरा है!

हर शख्स के हाथ में कटोरा है! ghazal

हर शख्स के हाथ में कटोरा है, जिसके पास जितना है.. थोड़ा है| साँस – साँस मुजरिम बनी है, मेरी हर साँस ने मुझे तोड़ा है| हर शख्स के हाथ में कटोरा है… हसरत ए ख़ुशी में भागता है वहशी,

इल्ज़ाम तूफ़ानों पर आता रहा

इल्ज़ाम तूफ़ानों पर आता रहा ghazal

मैं दिल का ग़ुबार उड़ाता रहा, इल्ज़ाम तूफ़ानों पर आता रहा| मैं छोड़ आया वो शहर ए वफ़ा, वो गली.. वो मोहल्ला बुलाता रहा| इल्ज़ाम तूफ़ानों पर आता रहा… मुद्दत हो गयी उसको टूटे हुए, वो ख़्वाब मगर.. जगाता रहा|

अच्छा लगता है…

अच्छा लगता है... ghazal

तुम से दिल की हर बात कहना अच्छा लगता है, इस बेगानी दुनिया में तू मुझे अपना लगता है| तुझ संग गुज़र रही है बहुत आराम से ज़िंदगी, तुझ बिन फूलों से भरा रास्ता खुर्दरा लगता है| तुम से दिल

ज़रूरतों की चक्की

ज़रूरतों की चक्की ghazal

कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में, खुद को पीछे छोड़ आये.. अपनों की तरक्की में| मुद्दत का थका हुआ था, तो आँख लग गयी, सारा मंज़र ही बदल गया.. एक झपकी में| कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में…

इंतिज़ाम

इंतिज़ाम ghazal

मयखानों में शराबों का इंतिज़ाम कीजिये, हम पढ़ने आये हैं, आँखों का इंतिज़ाम कीजिये| मुझे ढूंढ रहा है मेरा माज़ी गलियों गलियों, ए मेरी हसरत ओ तमन्ना, ठिकानों का इंतिज़ाम कीजिये| हम पढ़ने आये हैं, आँखों का इंतिज़ाम कीजिये… ये

कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह

कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह ghazal

हर दिन अपने लिए एक जाल बुनता हूँ, कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ| हर रोज़ इम्तिहान लेती है ज़िंदगी, हर रोज़ मगर मैं मोहब्बत चुनता हूँ| कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हू… बहुत

इजाज़त

इजाज़त ghazal

जिसकी इजाज़त दिल न दे वो काम मत कीजिये, इन हाथों से अपना खेल तमाम मत कीजिये| बेसबब नहीं होता कुछ भी यहाँ, खुद से गद्दारी का ये काम मत कीजिये| जिसकी इजाज़त दिल न दे वो काम मत कीजिये|

दिल बहुत ज़लील हुआ

दिल बहुत ज़लील हुआ ghazal

लम्हा मोहब्बत से अना में तब्दील हुआ, उसे दुनिया से मांग कर.. दिल बहुत ज़लील हुआ| तेरी बेरुखी मंज़ूर हो चली थी हमें, तेरा सच कहना रिश्ते की आखरी कील हुआ| उसे दुनिया से मांग कर दिल बहुत ज़लील हुआ…

तराशा हुआ पत्थर हूँ

तराशा हुआ पत्थर हूँ ghazal

तराशा हुआ पत्थर हूँ, अब बस टूटना बाकी है, पुर्ज़े तो मेरे कर चुके हो, अब बस लूटना बाकी है| हर शख्स इमारत ए सब्र के आखिरी छोर पर है, उम्मीद हार चुका है, अब बस कूदना बाकी है| तराशा

ज़िंदगी रूठी हुई

ज़िंदगी रूठी हुई ghazal

है लम्हें का अरमान मुझसे लिपट जाने का, देख रही है उसे हसरत से.. ज़िंदगी रूठी हुई| मैं अपने ख़्वाब जग ज़ाहिर नहीं करता, ये सलतनत है मेरी सभी से लूटी हुई| देख रही है उसे हसरत से ज़िंदगी रूठी

रोज़ देखता हूँ!

रोज़ देखता हूँ! ghazal

सियासत का वहशी नंगा नाच.. रोज़ देखता हूँ, हाथों में पत्थर, पैरों में कांच.. रोज़ देखता हूँ| कभी इसके सर तो कभी उसके सर टांग दिया, हर नए दिन का नया सरताज.. रोज़ देखता हूँ| हाथों में पत्थर, पैरों में

मगर कोई कमी है

मगर कोई कमी है ghazal

मैं तुझे अपनी आँखों में भर तो लूँ ज़रा, न जाने क्यों वक़्त को, गुज़रने की हड़बड़ी है| गुज़र जायेगा मगर.. फिर से आएगा ज़रूर, ये जीवन दुःख और सुख की कड़ी दर कड़ी है| न जाने क्यों वक़्त को,

सादगी गुमा दी

सादगी गुमा दी ghazal

सादगी गुमा दी माँ मैंने, ज़िंदगी उलझा ली माँ मैंने| मिली ना सुकूं की बूंद तो, आँख अपनी भिगा ली माँ मैंने| तू कहती थी हौंसला रख हमेशा, देख उम्मीद की लौ बुझा दी माँ मैंने| बनाता था कभी काग़ज़