Poems classified as: गीत

गीत मुख्य रूप से कविता की शैली को अपनाकर लिखा जाता है| इसे छंद और सूत्रों के आधार पर बनाया जाता है| गीत को गाने के लिए सरल बनाने के लिए गीतकार इसमें काफिये का भी इस्तेमाल करता है| गीत में हर शैली के प्रयोग और रस के अलंकारों की स्वतंत्रता रहती है|

कोई आने लगा मेरी यादों में

कोई आने लगा मेरी यादों में geet

कोई आने लगा मेरी यादों में मै बंधने लगा जिसके वादों में मै मांगता हूँ ख़ुशियाँ जिनकी रब से अब फ़रियादों में वो मिले तो छलकी आँखें ज्यूँ कोई बादल भादो में साँसों में वो, धड़कन में वो समायी मेरे

केसरिया ये रंग पिया

केसरिया ये रंग पिया geet

नटखट मोरे जब तो माखन खाये, माँ जसोदा का लाडला बाबा नन्द का दुलारा माँ देवकी की आँखों का तारा पिता वसुदेव का प्यारा सबको भाये, तुझ बिन मोहे कुछ नाहि भाये, तोहि प्रेम बन्सुरि जब सुनूँ तो बन्धन लाज

मन के अंदर

मन के अंदर geet

मन के अंदर कितने मन हैं? कुछ दुर्जन हैं कुछ सज्जन हैं मन के अंदर अनगिन मन हैं मन में हैं संकल्प अनगिनत शंकाएँ-संदेह अनगिनत अनुसंधान-विकल्प अनगिनत नाम-काम निष्काम अनगिनत भोर दुपहरी शाम अनगिनत श्रम-कोशिश-परिणाम अनगिनत साधन-साध्य अगेह जतन है

ग़ैर कहोगे जिनको

ग़ैर कहोगे जिनको geet

ग़ैर कहोगे जिनको वे ही मित्र सगे होंगे न माँगेंगे पानी-राशन न चाहेंगे प्यार नहीं लगायेंगे वे तुमको अनचाहे फटकार शिकवे-गिले-शिकायत तुमसे? होंगे कभी नहीं न ही जतायेंगे वे तुम पर कभी तनिक अधिकार काम पड़े पर नहीं आचरण प्रेम-पगे

हाज़िर हो

हाज़िर हो geet

समय न्यायधीश की लगती अदालत, गीत! हाज़िर हो, लगा है इल्ज़ाम तुम पर गिरगिटों सा बदलते हो रंग, श्रुति-ऋचा या अनुष्टुप बन छेड़ दी थी सरसता की जंग, रूप धरकर मन्त्र का या श्लोक का शून्य करते भंग, काल की

पशुपतिनाथ! तुम्हारे रहते

पशुपतिनाथ! तुम्हारे रहते geet

पशुपतिनाथ! तुम्हारे रहते जनगण हुआ अनाथ? वसुधा मैया भईं कुपित डोल गईं चट्टानें किसमें बूता धरती कब काँपेगी अनुमाने? देख-देख भूडोल चकित क्यों? सीखें रहना साथ, अनसमझा भूकम्प न हो अब मानवता का काल पृथ्वी पर भूचाल, हुए, हो रहे,

अपनों पर

अपनों पर geet

अपनों पर अपनों की तिरछी रहीं निगाहें, साये से भय खाते लोग दूर न होता शक का रोग बलिदानी को युग भूले अवसरवादी करता भोग सत्य न सुन सह पाते झूठी होती वाहें अपनों पर अपनों की तिरछी रहीं निगाहें,

धरती की छाती फटी

धरती की छाती फटी geet

धरती की छाती फटी फैला हाहाकार पर्वत, घाटी या मैदान सभी जगह मानव हैरान क्रंदन-रुदन न रुकता है जागा क्या कोई शैतान? विधना हमसे क्यों रूठा? क्या करुणा सागर झूठा? किया भरोसा क्या नाहक पल भर में ऐसे टूटा? डसते

हम एक हों

हम एक हों geet

हम एक हों, हम नेक हों, बल दो हमें जगदंबिके नित प्रात हो हम साथ हों नत माथ हो जगवन्दिते, नित भोर भारत-भारती वर दें हमें सब हों सुखी असहाय के प्रति हों सहायक हो न कोई भी दुखी| मत

अपनी बात

अपनी बात geet

पल दो पल का दर्द यहाँ है पल दो पल की खुशियाँ हैं आभासी जीवन जीते हम नकली सारी दुनिया है जिसने सच को जान लिया वह ढाई आखर पढ़ता है खाता पीता सोता है जग हाथ अंत में मलता

बाँस बना ताज़ा अखबार

बाँस बना ताज़ा अखबार geet

अलस्सुबह बाँस बना ताज़ा अखबार, फाँसी लगा किसान ने ख़बर बनाई खूब, पत्रकार नेता गए चर्चाओं में डूब, जानेवाला गया है उनको तनिक न रंज क्षुद्र स्वार्थ हित कर रहे जो औरों पर तंज़, ले किसान से सेठ को दे

ये मंसूरी की पहाड़ी

ये मंसूरी की पहाड़ी geet

ये मंसूरी की पहाड़ी सर्प सी लहरा रही है दिखती हैं सीढ़ियों सी घूमती ही जा रहीं हैं खाईयाँ हैं बहुत गहरी कांपती है प्रतिध्वनि भी झांकती हैं तरु मीनारें दिखती न इक कनी भी वादियाँ पर्वत की देखो गीत

इस जहां से जाने वाले

इस जहां से जाने वाले geet

इस जहां से जाने वाले बिन तेरे अब चैन कहाँ, धरती पर मेरे रखवाले बिन आँसू ये नैन कहाँ, दिन बीतता उलझन में नींद भरी अब रैन कहाँ, कैसा हूँ अब कौन हूँ मैं ख़बर को वो बेचैन कहाँ, सब

व्याकुल मन

व्याकुल मन geet

व्यथित व्याकुल मन आतुर है कबसे मन की वो बात करूँ तो अब किससे दर्शन को अब तो ये नयन भी तरसे चंचल चित तो अब विचलित हो बैठा, ढाढस दे इस दिल को समझाया नहीं है वो अब फिर

ऐसा तो नहीं कहा था

ऐसा तो नहीं कहा था geet

भरी सभा में एक द़ौपदी कोई त्रस्त हुई थी, कवच बने थे कृष्ण, लाज की रक्षा तुरंत हुई थी, आज हज़ारों द़ौपदियों की इज्ज़त दाव लगी है, नग्न देह चौराहों पर सिमटी कांप रही हैं, अट्टहास करता दुःशासन दुर्योधन हुंकार

नदी

नदी geet

पर्वतों की डगर नापती रही नदी सारे अभिशाप सहती रही नदी कल कल का राग लहरों का स्वर गीत मछुआरों के गाती रही नदी, हिमगिरि के द्वार ठहरी नहीं कभी बहने का आश्वासन देती रही नदी, मैदानी आँगन में कूदती

शिरीष एक गीत

शिरीष एक गीत geet

जिस आँगन में टहली हूँ मैं शिरीष एक पल्लवित हुआ है, हरा भरा है वृक्ष वहाँ पर नव कलियों से भरा हुआ है, सिंदूरी फूलों से लदकर टहनी टहनी गमक रही है, छटा निराली मन को भाए धूप मद भरी लटक

गाने का गुण है पंछी में

गाने का गुण है पंछी में geet

गाने का गुण है पंछी में जब भी वह दाने चुगता है वह तब ही गाने गाता है चाहे हो डंडी नुकीली चाहे हो फूलों की बगिया कैसी भी हों राहें पथरीली गीतों की तान सुनाता है ना जाने क्या

कोई धार तो मुझे बहा ले!

कोई धार तो मुझे बहा ले! geet

कोई धार तो मुझे बहा ले, कब तक बैठूं नदी किनारे| ऊब गया हूँ देख-देख कर, बहता पानी, रुके किनारे| विचारों का प्रवाह निरंतर, मैं की खोज में भटकता अंतर| या इस कंकड़ को जल बना ले, या इस कंकड़

सावन मेरे

सावन मेरे geet

लौटे नहीं हैं परदेस से साजन मेरे, तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे| अब आए हो तो दर पर ही रुकना, पाँव ना रखना तुम आँगन मेरे| तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे… तेरी ये गड़गड़ाहट,