Poems classified as: आज़ाद नज़्म

आज़ाद नज़्म किसी भी मीटर से आज़ाद होती है, इसमें मिसरों का होना या न होना अनिवार्य नहीं है और इसमें आमूमन एक ही विषय पर चर्चा की जाती है| मसलन अगर महबूब की बात की जा रही है तो सिर्फ उसी की बात श्रृंगार रूप में होती है हालाँकि उसे किसी भी रस के अलंकारों से सजाया जा सकता है|

तुम

तुम azad nazm

मुद्द्त हुई है तुमसे मिले नज़्में अब तुम्हारा पता पूछा करती हैं, खिड़की पर बैठी तुम्हारी राह देखती हैं मैं लफ़्ज़ों के नए पकवान बनाता हूँ, ये हर्फ़ चखे बग़ैर भी चली जाती हैं, तुम्हारे बग़ैर, नज़्मों का वज़न अब

धागे

धागे azad nazm

बचपन में देखते थे, माँ ऊन के दो भारी गोले लेकर, दो तीखी सिलाइयों पर गूंधती रहती थी, प्यार से भी मुलायम उँगलियों से, छोटी छोटी गिरहें बनाती थी, धागे यूँ घूम जाते थे, जैसे किसी बच्चे ने पानी के

ख़्वाब

ख़्वाब azad nazm

मेरे ही कानों में मेरी आवाज़ कहीं खो सी गई है, पलकें टूट कर बिखर कर बूँद बूँद हो गई हैं, अब मैं बंद आँखों से भी देख लेता हूँ सपने, सोने से पहले तकिये के नीचे रख लेता हूँ

हाथ

हाथ azad nazm

तुम्हारे ये दो हाथ जैसे मेरे दोनों जहान कभी जलती रेत कभी गीला आसमान इन हाथों से छुऊँ तो पाक हो जाऊँ न मिले इनका साया तो ख़ाक हो जाऊँ इन लकीरों के सहारे ज़िंदगी थमी है ये हाथ मेरा

लकीरें

लकीरें azad nazm

लकीरें ज़िंदगी की तरह उलझी हैं हथेली पर हर सिरा अधूरा सा कुछ तलाश रहा है, उँगलियों की खाली सीढ़ियाँ गिनती रहती हैं रात और दिन एक खालीपन सा फैला है इन हाथों पर, तेरे बिन, पलों को बटोर कर

कल रात

कल रात azad nazm

क्या कल रात तूने कोई नज़्म लिखी है? एक तारे के किनारे पे मुझे वो यक़ीनन दिखी है। क्या कल रात कोई ख़याल तेरे ज़हन से छूटा था? क्यूंकि इक रौशन तारा यकायक आसमान से टूटा था। क्या कल रात

इल्तिजा

इल्तिजा azad nazm

वो जो निशान बाकी रह गए हैं उन्हें मिटा दो, मेरे कहे जो सवाल हैं उन्हें भुला दो जहाँ कुछ याद ना रहे ऐसे जहाँ में ले चलो जहाँ तुम्हें भीड़ में ना खोजूं तुम्हारे गुम होने पर आंसू ना

नामुकम्मल

नामुकम्मल azad nazm

आब-ए-तलब तो हलक-ए-हासिलियत की मै नहीं होनी चाहिये ? मुसलसल तिश्नगी-ए-रुक्सत से हौसला-ओ-हिम्मत ज़वाल नहीं होनी चाहिए? इल्ज़ाम-ए-फाकह्मस्त से तारुफ़ रखते हैं मुसाफिर, प्यास-ए-ताजरिबह-ए-सरापा की लिखी ये आस , उनको नहीं होनी चाहिए? मौकापरस्त इस वक़्त की तूने बेशुमार कीमत

घर

घर azad nazm

तेरी आहट से, सारा घर फिर जीने लगता है वरना इस शहर के एक बेजान पुर्जे की तरह पड़ा रहता है किसी कोने में…सुस्त, सहमा, डरा सा! तेरे आते ही इसकी साँसे अपने आप चलने लगती हैं दरवाज़े खिड़कियाँ, पर्दों

स्याही के धब्बे

स्याही के धब्बे azad nazm

स्याही के कुछ धब्बों सा हूँ मैं तुम इनमें मतलब ना ढूंढो, छिड़क गया था कोई बेइरादा इन्हें, कुछ उलझे लफ़्ज़ों का भँवर है, जिनमें डूबती हैं कुछ काग़ज़ की कश्तियाँ, संभालो, तुम्हारी उँगलियों से भँवर टूट ना जाए.. के

साफसफाई

साफसफाई azad nazm

यादों को पोंछ पाछ कर रखना है यादों पर बेबसी की धुल जमी है, दिल के कोने में पड़े पड़े ज़ंग लग गया है इन यादों पर मजबूरियों का ज़ंग! कितनी खूबसूरती से जिया था ये लम्हा हमने और सोचा

घाव

घाव azad nazm

छतें ही छतें हैं बस दूर तक जहाँ नज़र हांफने लगे, दराज़ मकान ऊपर तक, जहाँ आँखें अपने ही वज़न से गिरने लगें, हवा में रखी सलीबों पर फंदों से झूलते लोग अपनी अपनी उदासी पर मुस्कानें बनाते हैं, मिटाते

चाँद भी कोई कम शैतान नहीं

चाँद भी कोई कम शैतान नहीं azad nazm

कुछ बच्चे खेल रहे थे रात की सड़क पर तारों के कंचों से, चाँद को मार गिराने का खेल और खेल ही खेल में पता भी न चला उन्हें कि कंचों की मार से चाँद के चहरे पर पड़ गए