Poems classified as: आज़ाद नज़्म

आज़ाद नज़्म किसी भी मीटर से आज़ाद होती है, इसमें मिसरों का होना या न होना अनिवार्य नहीं है और इसमें आमूमन एक ही विषय पर चर्चा की जाती है| मसलन अगर महबूब की बात की जा रही है तो सिर्फ उसी की बात श्रृंगार रूप में होती है हालाँकि उसे किसी भी रस के अलंकारों से सजाया जा सकता है|

याद

याद azad nazm

अभी कल शाम से ही इक याद सोई रही आँगन के सिरहाने कितने ख़ुशरंग होते थे ये मौसम भी जब हवाओं में तुम्हारे यहाँ होने के अहसास इतने ज़िन्दा होते थे कि कनखियों से झाँक कर देख लेने का सुकून

एक टूटी हुई खिड़की

एक टूटी हुई खिड़की azad nazm

एक टूटी हुई खिड़की और धूप की सलवटों में छिपी एक परछाई ढूंढती हुई भीड़ में किसी अपने को एक ख़ामोश तड़प उसे देख लेने की जो कुछ न होते हुए भी था सब कुछ वो निगाह जो मुझे तुममें

ये शहर

ये शहर azad nazm

ये शहर जो सोया हुआ है अपने ही तसव्वुर में खोया हुआ है इस शहर की ख़ामोशी का अजब अंदाज़ है यहाँ फ़िज़ाओं में बहती सपनों की आवाज़ है ये शहर जो पेड़ों से बुना हुआ है अपने जिस्म पर

एक मासूम सी अठन्नी

एक मासूम सी अठन्नी azad nazm

एक मासूम सी अठन्नी मेरी जेब में बदमाश से रुपये से लग के गले खनकती है, इनके होने के एहसास से, मेरी जेब अब दमकती इसकी अल्हढ़ सी आहटों से, मेरी जेब कुछ मचलती है, ये मासूम क्या जाने दर्द

क्या नया लिखूँ आपके लिए

क्या नया लिखूँ आपके लिए azad nazm

क्या नया लिखूँ आपके लिए जो नहीं कहा अब तक… आज सोचा लिखूँ बहुत कुछ तभी काग़ज़ ने पूछ लिया… है कौन वह जिनके लिए शब्द ढूंढ रही है? क्या नाम है, कितना पहचानती है उसे? मुस्कुरा कर कलम उठा कर

आज है आपसे दूसरी मुलाक़ात

आज है आपसे दूसरी मुलाक़ात azad nazm

आज है आपसे दूसरी मुलाक़ात पहली की मैं क्या कहूँ एक दिन ढूंढ रही थी क़िताबों में एक कवि एक शायर आपकी नज़्मों पर जब अटकी नज़र मेरी गर्दिश-ए-दौर में उस झलक की मैं क्या कहूँ ख़ामोश ज़िन्दगी के अफ़सानों

मैं ख़्वाब और ख़ामोशी

मैं ख़्वाब और ख़ामोशी azad nazm

फिर वही मैं, एक ख़्वाब और कुछ ख़ामोशी एक अजनबी शाम की तरह धुंधलाता हुआ सा तुम्हारा चेहरा अपने ही टुकड़ों पर मुस्कुराता एक टूटा हुआ दिल और उसमें बिखरी पड़ी तुम्हारे हुस्न की कहानी जो मैंने अब तक गिरते

कवि

कवि azad nazm

वो जीता है काग़ज़ों में कई ज़िन्दगी हर रोज़, मगज़ से निकल पन्नों तक आते कई बिम्ब उलझ जाते हैं सुलझाता है उन्हें अँधेरे में बैठ, शब्दों से बुनकर गढ़ता है नए चित्र, टांगता है ख़यालों को सृजन की ऊँचाई

मेरे घर के कोने में रखी कुछ किताबें

मेरे घर के कोने में रखी कुछ किताबें azad nazm

मेरे घर के कोने में रखी कुछ किताबें सूरज की रौशनी को खुद में समाए अपने उजाले से मेरे मन के अंधेरों को चीरतीं, हवा जिन्हें जब छूकर निकले तो अपने शब्दों के कम्पन से सुनाती हैं एक गुमी हुई

बेअक्ल पुरखे

बेअक्ल पुरखे azad nazm

पुरखे चढ़े रहते हैं कंधों पर बेताल की तरह सदियों बाद भी, रीति रिवाज़ों और परम्पराओं के नाम पर, पर हम ढोते हैं उन्हें जन्म से लेकर मृत्यु तक, पूरी उम्र बिना सवाल के कोई दोहराते हैं वही जो पीढ़ियाँ

न्यूट्रल ज़मीन

न्यूट्रल ज़मीन azad nazm

बड़ी “न्यूट्रल” सी ज़मीन थी पहले कुछ भी नहीं था वहाँ कुछ होता नहीं था फिर एक दिन उसी ज़मीन के एक टुकड़े पर, हिन्दू शमशान भूमि बनी और कुछ दिनों बाद बिल्कुल बगल में एक सुन्नी क़ब्रिस्तान जलती हुई

कश्मकश

कश्मकश azad nazm

क्या बयां करूँ मंज़र-ए-दास्तान? जब कि पूरी की पूरी महफ़िल फीकी है, भरे पूरे बाज़ार में कई ठेकेदार लेकिन मस्त सरोकार की कमी है, रंगो-शबाब के साये में भी तस्वीर “वह” कोसों दूर है, सपनों की बारात में दूल्हा ही

लकीरें

लकीरें azad nazm

लकीरें रंग बदलती हैं कभी वो राहें नहीं मिलेंगी रोज़ मुझे ज़ुबान पे कुछ और दिल से कुछ न कहो मैं राहों पे चलते ही तुम्हें ढूँढ लूँगा आओ..हम इस पार मिलें जहाँ पे दो लकीरों को बदलते देखा था

बारिश

बारिश azad nazm

बारिश हो रही है सुनो किसी बहाने से घर से निकलकर तुम आना बना कर कोई अच्छा बहाना के बारिशों में भीगे एक मुद्दत सी हो गई ये बूँदें ख़्वाहिशों के कोई बीज बो गई नुक्कड़ वाली दुकान पर छाता

साँसों के धागे

साँसों के धागे azad nazm

दर्ज़ी है वो कौन जिसके हाथों में ये ज़िंदगी की मशीन है साँसों के धागों से बाहम जिस्म-ओ-रूह को सिलते जा रहा है टाँकेगा वो जब तक साँसों के धागे ये रूह और जिस्म साथ साथ चलेंगे यूँ ही जैसे

मिसरा

मिसरा azad nazm

एक मिसरा कहीं अटक गया है दरमियाँ मेरी ग़ज़ल के जो बहती है तुम तक जाने कितने ख़याल टकराते हैं उससे और लौट आते हैं एक तूफ़ान बनकर कई बार सोचा निकाल ही दूँ उसे तेरे मेरे बीच ये रुकाव क्यूँ?

इक नई शुरूआत

इक नई शुरूआत azad nazm

न जाने इस दिमाग में यादों के कितने कमरे हैं, कुछ खुले पड़े हैं और कुछ बरसों से बंद उन कमरों की चाबी नहीं मेरे पास, शायद कुछ रिश्तों के साथ ये कमरे भी ख़त्म हो चुके हैं, सीलन पडीं

कब?

कब? azad nazm

ग़म नहीं है तुम्हारे न होने का बस एक अजीब सा अधूरापन है, जैसे के कमरे के बीच से किसी ने अलमारी, पलंग, मेज़, गुल कर दी हो, अब, आवाज़ें गूंजती हैं दीवारों से टकरा कर मेरे ही पास लौट

तुम

तुम azad nazm

तुम अक्स हो किसी ख़्वाब का जो मेरी नींद पर तुम्हारी ख़ुशबू से बना है किसी नज़्म की धुन हो जो मैंने कभी पढ़ी नहीं न ही सुनी है बस महसूस की है अपने बीच की ख़ामोशी में तुम गहराई

बहुत देर हो चुकी

बहुत देर हो चुकी azad nazm

ना मरहम लगाओ अब इन पुराने सूखे ज़ख्मों पर, देखो ये फिर ताज़ा हो चले हैं ना कुरेदो अब इन पर चढ़ी इस छाल को, देखो ये फिर सुर्ख़ हो चले हैं… बहुत देर हो चुकी कि अब तुम लौट

आँसू

आँसू azad nazm

मेरी आँखों के नीचे वो सारी रातें जम गयी हैं जो मैंने तेरी याद में जागकर काटीं थीं आँखों से ये बहते आँसू आँसू जुदाई के…खारे आँसू इन रातों के निशाँ धो नहीं पाते इन रातों की भँवर सी गहराइयों

वो खारा काग़ज़

वो खारा काग़ज़ azad nazm

मेरी किताबों की अलमारी में एकदम अन्दर , दुबकी हुई सी बैठी तुम्हारी कविताओं की कॉपी, पन्ने पलटते पलटते ज़ुबां पर इक पन्ने का खारा स्वाद आया है अचानक … कोरा है ये पन्ना.. कलम शायद ख़ामोश रही होगी यहाँ,

तेरी यादें

तेरी यादें azad nazm

कभी यूँ ही बेवजह रो लेती हूँ, ये जो तेरी यादें अटकी पड़ीं हैं दिल में, आसूँ के साथ शायद बह कर निकल जाएँ.. थोड़ा सा मुझे भी चैन आए.. जो तेरा चहरा मैं भुला पाऊँ, अगली बार जब दिखो

वक़्त की सुराही

वक़्त की सुराही azad nazm

वक़्त की सुराही से कुछ बूँद लम्हे चुराने की कोशिश में हूँ, बचपन की कहानी के उस कौवे की तरह, कंकड़ ड़ाल कर देखूँ, शायद थोड़ा वक़्त और मिल जाए, पर देखती हूँ कि सुराही में ही दरार पड़ी है,

परिचय

परिचय azad nazm

मैंने काग़ज़ के कई परिंदे बनाए, और छोड़ दिए, उड़ते रहते हैं अब यूँ ही मेरे घर की छतों पर, मैं थकान जेबों में भरकर जब भी, घर में रौशनी करता हूँ, तो तितर-बितर हो जाते हैं, और छुप कर

दर्द

दर्द azad nazm

हम पहले एक साथ ही रहते थे, खिड़की से आती धूप दोनों में बंट जाया करती थी, दोनों का रंग एक हो जाता था, दिन भर हम एक दूसरे  के कान में फुसफुसाते रहते, और अपना अपना फ़र्ज़ खूब निभाते

तुम

तुम azad nazm

मुद्द्त हुई है तुमसे मिले नज़्में अब तुम्हारा पता पूछा करती हैं, खिड़की पर बैठी तुम्हारी राह देखती हैं मैं लफ़्ज़ों के नए पकवान बनाता हूँ, ये हर्फ़ चखे बग़ैर भी चली जाती हैं, तुम्हारे बग़ैर, नज़्मों का वज़न अब

धागे

धागे azad nazm

बचपन में देखते थे, माँ ऊन के दो भारी गोले लेकर, दो तीखी सिलाइयों पर गूंधती रहती थी, प्यार से भी मुलायम उँगलियों से, छोटी छोटी गिरहें बनाती थी, धागे यूँ घूम जाते थे, जैसे किसी बच्चे ने पानी के

ख़्वाब

ख़्वाब azad nazm

मेरे ही कानों में मेरी आवाज़ कहीं खो सी गई है, पलकें टूट कर बिखर कर बूँद बूँद हो गई हैं, अब मैं बंद आँखों से भी देख लेता हूँ सपने, सोने से पहले तकिये के नीचे रख लेता हूँ