Poems classified as: हिंदी और उर्दू की कवितायें

इस संकलन में हिंदी, उर्दू और हिन्दुस्तानी में लिखी जाने वाली मूल रूप की कवितायें प्रकाशित हैं| कुछ कवि या शायर अपनी रचनाओं में बृजभाषा या पंजाबी के कुछ शब्दों का प्रयोग भी करते हैं| वे रचनाएँ भी इसी संकलन में प्रकाशित की जायेंगी| इसमें मुख्य रूप से ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई, गीत, त्रिवेणी, हाइकु, व्यंग, भजन और दोहों का चयन किया गया है|

कुछ मजबूरियां बयां नहीं होती

कुछ मजबूरियां  बयां नहीं होती ghazal

कुछ मजबूरियां बयां नहीं होती वरना ये दूरियां, कहां नहीं होती अन्दर से अब खोखले से लगते हैं तुम जहां रहती थी वहां नहीं होती जाने किस वक्त का इन्तजार है मेरे इन्तजार की इन्तहा नहीं होती बातें तो तुमसे

नारी

नारी kavita

मेरी माँ,साठ साल की डरी सहमी बच्ची है, हिंदुस्तानी है,पर पिताजी से पहले खाती नहीं। दुःख में अपने दर्द जताती नहीं।। यह राखी जन्मों का वादा है, एक रुखी लालसा,पल में बहना, पल में वेश्या बना देता है। रात को

भुलाया नहीं जाता !

भुलाया नहीं जाता ! kavita

संग गुज़री यादों को अब भुलाया नहीं जाता ! दिल में जगे जज़्बातों को अब सुलाया नहीं जाता !! झेल लिए ढेरो सितम उसके हर घड़ी,हर डगर, मगर मासूम-सी उसकी सूरत देख बेवफ़ा उसे बुलाया नहीं जाता ! जी करता

दिल की बातें

दिल की बातें kavita

*दिल की बातें* आ कंही मिल कर बैठ कर दिल की बातें करते है कुछ तुम सुनाना कुछ मैं सुनाऊंगा। कुछ तुम सुनना कुछ मैं सुनूंगा। जो कह न सकी तुम कभी किसी से वो मुझसे कहना। आ कंही मिल

मै

मै kavita

आज अकेले मे मुझको कुछ याद आ गया सुनो तुम भी ,वो कुछ मुझे भी सुना गया जिनके आने से महक जाते थे तर्रनुम मेरे वो आज फिर मेरे सामने आ गया। क्या कहु उन्हें खबर तक नहीं मेरी पलके

काश से घिरा जीवन

काश से घिरा जीवन kavita

काश! से घिरी जीवन की अपेक्षाएँ काश! कि ज़िन्दगी में कोई काश न आए काश! हम अपने हर सपने को हक़ीकत में जी पाएँ काश! इस काश को हम ज़िन्दगी से मिटा पाएँ काश! हम सपनों को ज़िन्दगी से रूबरू

नाच रहा है मोर

नाच रहा है मोर kavita

हो गया है भोर, वर्षा हुई घनघोर; बाँधे प्रीति की डोर, नाच रहा है मोर| बयार चल रही चारों ओर, तृप्त हुआ अवनी का एक-एक छोर; बाँधे प्रीति की डोर, नाच रहा है मोर| उर में हर्ष नहीं है थोर,

अग्रीमेंट ज़रूरी है

अग्रीमेंट ज़रूरी है vyang

मर्ज़ भले कोई हो ट्रीटमेंट ज़रूरी है जंक फ़ूड के साथ सप्लिमेंट ज़रूरी है रखिये न इसे बाँधकर ज़ोर ज़बरदस्ती से दिल की सेहत के लिए मूवमेंट ज़रूरी है खिल के हँसे मुस्कुराए तो सोचता है दिल क्या फूलों को

ज़िन्दगी एक मरीचिका

ज़िन्दगी एक मरीचिका kavita

उम्र गुज़ार दी साथ चलते – चलते फिर भी क्यों लगती है यह ज़िन्दगी एक अजनबी सी…? मंज़िलें क्यों वैसी नहीं है लगतीं जैसी थी सपनों में दिखा करतीं जो भी पीछे छोड़ा या पाया अब तक अलग तो नहीं

ओस की बूंदों सी तुम

ओस की बूंदों सी तुम azad nazm

शाम गिलहरियों के साथ बैठकर कटी दिल वक़्त के सांचे में ढलती ज़िन्दगी का अंतर्नाद गाने लगा तो उठकर चल पड़ा खेतों के बीच होकर गुज़रती सींव पर पहाड़ों की ओर इस शहर से इतना ही वास्ता है जितना कौवों,

ख़ुदा की रहमतें

ख़ुदा की रहमतें kavita

ख़ुदा के हाथ की थपकियां सर पे जब भी चाहीं मैं माँ के आँचल का एहसास सिर पे ले आया ख़ुदाई महसूस करने के अरमान जब जगे, मैं दरख्तों को अपने सीने से लगा आया उदासीयों ने जब भी आगोश

ख़्वाब

ख़्वाब kavita

ख़्वाबों की दुनिया में बिचरता यह मन कभी कभी न चाहते हुए भी कितने रंगों की रंगोली में रंग जाता है और मैं इन्हीं रंगों को यथार्थ समझ मन बहलाने की कोशिश करने लगता हूँ पर क्या इस क्षणिक अहसास

तुमसे दूर माँ

तुमसे दूर माँ kavita

कौन सा ख़्वाब चाहूँ कि नींद आ जाये कैसे बंद करूँ आँख कि नींद आ जाये सोचती ही रहूँ कि बस यूँ ही देखती ही रहूँ गर सोचूँ भी तो क्या कि नींद आ जाये मनचाहे ख़्वाब देखने की कोशिश

इंतेज़ार सिर्फ़ तुम्हारा

इंतेज़ार सिर्फ़ तुम्हारा azad nazm

उनकी क़दमों की आहट से दिल जाग उठता है बरसों से सोया हुआ दिल फिर भाग उठता है कभी जो आओ तो ख़बर न देना मुझ को मुझे इस दिल की तमन्ना का एतबार करना है बरसों से सोये हुए

आईना ए जहां

आईना ए जहां kavita

सबने जिसको धूप कहा, हमें वही सूरज का नूर लगा पसीने की रोशनाई* से नसीब के हिस्से लिखे हमने कई दुश्वारियाँ अपने हिस्से हमने अपने आप लिखीं उसूल-ओ-ईमान पे चलने के कड़वे घूँट ख़ूब चखे हमने बदलते वक़्त पे ग़ैरों

फ़लसफ़ा ए आदमी

फ़लसफ़ा ए आदमी kavita

विसाल-ए-महबूब तो शानों पे सर फ़िराक़-ए-महबूब तो ज़ानू पे सर बग़लगीर महबूब तो हसीन तन्हाइयाँ फ़िराक़-ए-महबूब तो खूँखार तन्हाइयाँ ख़ुमार-ए-कामयाबी तो मैक़दे दुश्वार-ए-हालात तो सनमक़दे बोसा-ए-कामयाबी तो मेरी तदबीरें गर्दिश-ए-दौरां तो अपनी फूटी तकदीरें शोहरतें दौलतें तो यार हम-प्याले खाली

रिसते घावों को सोने दो

रिसते घावों को सोने दो azad nazm

देखो, कुछ देर के लिए सोने दो मेरे रिसते घावों को अभी अभी आई है मेरे प्रश्नों को नींद, मुझे मत कहो ग़ुलाबक बिसरी याद हूँ जाग जाऊँगा, मुझे मत कहो गीत सुलग जाऊँगा बर्फ़ीले पहाड़ों पर मुझे दवा चाहिए

हक़ीकत-ए-ज़िन्दगी

हक़ीकत ए ज़िन्दगी kavita

लम्हे बुरे वक़्त के बड़े ही काम के निकले मेरी आस्तीनों में से कई अज़ीज़ साँप निकले, दुनिया वाले जिस पे आँखें मूँद के गुज़रे हम उस रह गुज़र पे भूल से भी नहीं निकले, रंग -रूप, पैराहन पे ही

ख़्वाहिशें

ख़्वाहिशें kavita

आज फिर माँ की यादों ने घेर लिया, जी चाहा मैं फिर से शरीर* हो जाऊँ तू मुझसे मिलने का मन बना तो सही, तेरे लिए मैं ख़ुद ही रास्ता हो जाऊँ हवस-ए-बदन को उल्फ़त बताने वालों, जी में आता

भेद

भेद kavita

न बात हुई न अश्क छुपा, न याद गई न शख्स रुका, न ढुलका आँसू का कतरा, न ही दरिया में सीप मिला, न रुका शंख का नाद यहाँ, न युद्ध रुका न प्रेम दिखा, न सूरज डूबा पश्चिम में,

वो मोहब्बतें वो ज़माना

वो मोहब्बतें वो ज़माना ghazal

अब कहाँ वो पहले जैसी मोहब्बतें, अब कहाँ वो पहले के जैसा ज़माना वो पहले सा नज़रों का मिलना कहाँ अब, कहीं खो गया वो शर्मा के नज़रें झुकाना अब कहाँ वो ख़तों का लिखना-लिखाना, क़ासिद के दिखते ही दिल

याद-ए-रफ़्तगा

याद ए रफ़्तगा ghazal

लोगों में कुछ तो ढूंढता हूँ, जाने क्या अंदर नहीं रहता जो सुकूँ आ भी जाए तो फिर, सुकूँ अंदर नहीं रहता सीख ले हदें अपनी समन्दर, फिर समन्दर नहीं रहता क़ैद गिरहों में हो जाए फ़कीर, फिर कलंदर नहीं

मेरे विचार मेरे हमसफ़र

मेरे विचार मेरे हमसफ़र kavita

अभी निकला हूँ बड़ी उम्मीद से कि राहें गुलबदन सी रौशन होंगी, उस कुम्हार से हर रोज़ इक ख़्वाहिश लिये चलता हूँ । यूँ ही न भटकता रहूँ मैं इस अपार चराचर में, मंज़िलों का सपना लिए मैं रोज़ भटकता

बुढ़ापा

बुढ़ापा kavita

Photo by VinothChandar उम्र की हर ऋतु का बन जाए जो समागम, ऐसी सोंधी ख़ुश्बू सा होता बुढ़ापे का मौसम, जीवन की राहों में बेनाम हुए जो अरमान, बुढ़ापे के अंशुल ने दी उन्हे हसीन उड़ान, चाहतों के लेकर पंख

गौरय्या

गौरय्या kavita

लो फिर आ धमकी वह नन्हीं गौरय्या चोंच में दबाये एक छोटा सा तिनका निःशंक जैसे हो उसका ही घर यह घोंसला बनाने का कर के इरादा कैसी भोली, नासमझ है गौरय्या! समझाया था उसको अनेक बार मैंने सुरक्षित नहीं

मेरी ज़िंदगी

मेरी ज़िंदगी ghazal

“मोहरा बनना मुझे कभी कहीं कबूल रहा नहीं, ज़िन्दगी मुश्किल सही,पर अपनी शर्तों पे जी मैंने” “तकदीरों को मुझ पे मेहरबान होनी ही पड़ा, अपनी तदबीरो में कभी कोई कमी नहीं की मैंने” “दुनिया बेहद हसीं, ज़िन्दगी पुरबहार होने लगी,

तुम

तुम ghazal

ये यादों का मौसम, रोज़ सुनहरा नही रहता दाग रह जाते हैं, सदा जख्म हरा नही रहता यूं तो कोई भी अजनबी नहीं है इस शहर में तेरे जैसा मगर यहाँ, कोई चेहरा नहीं रहता तू खुशबु है हर सम्त

याद

याद azad nazm

अभी कल शाम से ही इक याद सोई रही आँगन के सिरहाने कितने ख़ुशरंग होते थे ये मौसम भी जब हवाओं में तुम्हारे यहाँ होने के अहसास इतने ज़िन्दा होते थे कि कनखियों से झाँक कर देख लेने का सुकून

नदी

नदी kavita

नदी को बहने दो बहती रहने दो उसे बांधो मत उसकी उन्मुक्त जलधार को अपनी स्वार्थ सिद्धि के निमित्त बहने दो उसे अविराम, अविकल क्योंकि अनंत अवरोधों के बीच भी निरंतर प्रवाहमान रहना ही तो है उसकी प्रकृति और नियति

यात्रा

यात्रा kavita

दिन चढ़ेगा आज सूरज भी निकलेगा लेकिन, थोड़ी सी ठंडक होगी फ़िज़ाओं में और साथ घुलेगी कुछ महक भी मद्धम सी, इन हवाओं के रस्ते होंगे नदियाँ होंगी, धाराओं को चीरकर बांधों के ऊपर से निकलकर हवाएँ चलेंगी ऐसे जैसे