Poems classified as: हिंदी और उर्दू की कवितायें

इस संकलन में हिंदी, उर्दू और हिन्दुस्तानी में लिखी जाने वाली मूल रूप की कवितायें प्रकाशित हैं| कुछ कवि या शायर अपनी रचनाओं में बृजभाषा या पंजाबी के कुछ शब्दों का प्रयोग भी करते हैं| वे रचनाएँ भी इसी संकलन में प्रकाशित की जायेंगी| इसमें मुख्य रूप से ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई, गीत, त्रिवेणी, हाइकु, व्यंग, भजन और दोहों का चयन किया गया है|

ख़ुदा की रहमतें

ख़ुदा की रहमतें kavita

ख़ुदा के हाथ की थपकियां सर पे जब भी चाहीं मैं माँ के आँचल का एहसास सिर पे ले आया ख़ुदाई महसूस करने के अरमान जब जगे, मैं दरख्तों को अपने सीने से लगा आया उदासीयों ने जब भी आगोश

ख़्वाब

ख़्वाब kavita

ख़्वाबों की दुनिया में बिचरता यह मन कभी कभी न चाहते हुए भी कितने रंगों की रंगोली में रंग जाता है और मैं इन्हीं रंगों को यथार्थ समझ मन बहलाने की कोशिश करने लगता हूँ पर क्या इस क्षणिक अहसास

तुमसे दूर माँ

तुमसे दूर माँ kavita

कौन सा ख़्वाब चाहूँ कि नींद आ जाये कैसे बंद करूँ आँख कि नींद आ जाये सोचती ही रहूँ कि बस यूँ ही देखती ही रहूँ गर सोचूँ भी तो क्या कि नींद आ जाये मनचाहे ख़्वाब देखने की कोशिश

इंतेज़ार सिर्फ़ तुम्हारा

इंतेज़ार सिर्फ़ तुम्हारा azad nazm

उनकी क़दमों की आहट से दिल जाग उठता है बरसों से सोया हुआ दिल फिर भाग उठता है कभी जो आओ तो ख़बर न देना मुझ को मुझे इस दिल की तमन्ना का एतबार करना है बरसों से सोये हुए

आईना ए जहां

आईना ए जहां kavita

सबने जिसको धूप कहा, हमें वही सूरज का नूर लगा पसीने की रोशनाई* से नसीब के हिस्से लिखे हमने कई दुश्वारियाँ अपने हिस्से हमने अपने आप लिखीं उसूल-ओ-ईमान पे चलने के कड़वे घूँट ख़ूब चखे हमने बदलते वक़्त पे ग़ैरों

फ़लसफ़ा ए आदमी

फ़लसफ़ा ए आदमी kavita

विसाल-ए-महबूब तो शानों पे सर फ़िराक़-ए-महबूब तो ज़ानू पे सर बग़लगीर महबूब तो हसीन तन्हाइयाँ फ़िराक़-ए-महबूब तो खूँखार तन्हाइयाँ ख़ुमार-ए-कामयाबी तो मैक़दे दुश्वार-ए-हालात तो सनमक़दे बोसा-ए-कामयाबी तो मेरी तदबीरें गर्दिश-ए-दौरां तो अपनी फूटी तकदीरें शोहरतें दौलतें तो यार हम-प्याले खाली

रिसते घावों को सोने दो

रिसते घावों को सोने दो azad nazm

देखो, कुछ देर के लिए सोने दो मेरे रिसते घावों को अभी अभी आई है मेरे प्रश्नों को नींद, मुझे मत कहो ग़ुलाबक बिसरी याद हूँ जाग जाऊँगा, मुझे मत कहो गीत सुलग जाऊँगा बर्फ़ीले पहाड़ों पर मुझे दवा चाहिए

हक़ीकत-ए-ज़िन्दगी

हक़ीकत ए ज़िन्दगी kavita

लम्हे बुरे वक़्त के बड़े ही काम के निकले मेरी आस्तीनों में से कई अज़ीज़ साँप निकले, दुनिया वाले जिस पे आँखें मूँद के गुज़रे हम उस रह गुज़र पे भूल से भी नहीं निकले, रंग -रूप, पैराहन पे ही

ख़्वाहिशें

ख़्वाहिशें kavita

आज फिर माँ की यादों ने घेर लिया, जी चाहा मैं फिर से शरीर* हो जाऊँ तू मुझसे मिलने का मन बना तो सही, तेरे लिए मैं ख़ुद ही रास्ता हो जाऊँ हवस-ए-बदन को उल्फ़त बताने वालों, जी में आता

भेद

भेद kavita

न बात हुई न अश्क छुपा, न याद गई न शख्स रुका, न ढुलका आँसू का कतरा, न ही दरिया में सीप मिला, न रुका शंख का नाद यहाँ, न युद्ध रुका न प्रेम दिखा, न सूरज डूबा पश्चिम में,

वो मोहब्बतें वो ज़माना

वो मोहब्बतें वो ज़माना ghazal

अब कहाँ वो पहले जैसी मोहब्बतें, अब कहाँ वो पहले के जैसा ज़माना वो पहले सा नज़रों का मिलना कहाँ अब, कहीं खो गया वो शर्मा के नज़रें झुकाना अब कहाँ वो ख़तों का लिखना-लिखाना, क़ासिद के दिखते ही दिल

याद-ए-रफ़्तगा

याद ए रफ़्तगा ghazal

लोगों में कुछ तो ढूंढता हूँ, जाने क्या अंदर नहीं रहता जो सुकूँ आ भी जाए तो फिर, सुकूँ अंदर नहीं रहता सीख ले हदें अपनी समन्दर, फिर समन्दर नहीं रहता क़ैद गिरहों में हो जाए फ़कीर, फिर कलंदर नहीं

मेरे विचार मेरे हमसफ़र

मेरे विचार मेरे हमसफ़र kavita

अभी निकला हूँ बड़ी उम्मीद से कि राहें गुलबदन सी रौशन होंगी, उस कुम्हार से हर रोज़ इक ख़्वाहिश लिये चलता हूँ । यूँ ही न भटकता रहूँ मैं इस अपार चराचर में, मंज़िलों का सपना लिए मैं रोज़ भटकता

बुढ़ापा

बुढ़ापा kavita

Photo by VinothChandar उम्र की हर ऋतु का बन जाए जो समागम, ऐसी सोंधी ख़ुश्बू सा होता बुढ़ापे का मौसम, जीवन की राहों में बेनाम हुए जो अरमान, बुढ़ापे के अंशुल ने दी उन्हे हसीन उड़ान, चाहतों के लेकर पंख

गौरय्या

गौरय्या kavita

लो फिर आ धमकी वह नन्हीं गौरय्या चोंच में दबाये एक छोटा सा तिनका निःशंक जैसे हो उसका ही घर यह घोंसला बनाने का कर के इरादा कैसी भोली, नासमझ है गौरय्या! समझाया था उसको अनेक बार मैंने सुरक्षित नहीं

मेरी ज़िंदगी

मेरी ज़िंदगी ghazal

“मोहरा बनना मुझे कभी कहीं कबूल रहा नहीं, ज़िन्दगी मुश्किल सही,पर अपनी शर्तों पे जी मैंने” “तकदीरों को मुझ पे मेहरबान होनी ही पड़ा, अपनी तदबीरो में कभी कोई कमी नहीं की मैंने” “दुनिया बेहद हसीं, ज़िन्दगी पुरबहार होने लगी,

तुम

तुम ghazal

ये यादों का मौसम, रोज़ सुनहरा नही रहता दाग रह जाते हैं, सदा जख्म हरा नही रहता यूं तो कोई भी अजनबी नहीं है इस शहर में तेरे जैसा मगर यहाँ, कोई चेहरा नहीं रहता तू खुशबु है हर सम्त

याद

याद azad nazm

अभी कल शाम से ही इक याद सोई रही आँगन के सिरहाने कितने ख़ुशरंग होते थे ये मौसम भी जब हवाओं में तुम्हारे यहाँ होने के अहसास इतने ज़िन्दा होते थे कि कनखियों से झाँक कर देख लेने का सुकून

नदी

नदी kavita

नदी को बहने दो बहती रहने दो उसे बांधो मत उसकी उन्मुक्त जलधार को अपनी स्वार्थ सिद्धि के निमित्त बहने दो उसे अविराम, अविकल क्योंकि अनंत अवरोधों के बीच भी निरंतर प्रवाहमान रहना ही तो है उसकी प्रकृति और नियति

यात्रा

यात्रा kavita

दिन चढ़ेगा आज सूरज भी निकलेगा लेकिन, थोड़ी सी ठंडक होगी फ़िज़ाओं में और साथ घुलेगी कुछ महक भी मद्धम सी, इन हवाओं के रस्ते होंगे नदियाँ होंगी, धाराओं को चीरकर बांधों के ऊपर से निकलकर हवाएँ चलेंगी ऐसे जैसे

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी kavita

ज़िन्दगी क्या है, एक अनबुझी पहेली सी कुछ सुलझाती, कुछ उलझाती अजीब अनकही सी, ज़िन्दगी एक धड़कन सी, कभी शोर में ख़ामोशी सी दर्द में मुस्कुराती वो मन की आॅखों से पढ़ती दर्द वो सारे, ज़िन्दगी एक समझौते सी, उठती

बस एक क़दम और

बस एक क़दम और kavita

बस एक क़दम और अब तो किनारा होगा बस एक निगाह और अब तो इशारा होगा अम्बर के नीचे, उस आशा के पीछे, कोई तो किरण होगी जीतते रहने की, कोई तो ललक होगी जो किरण को पा लिया, वो

बिना किसी मतलब के

बिना किसी मतलब के kavita

बिना किसी मतलब के वो आँख भी उठाता नहीं, बिना किसी मतलब के वो कहीं आता -जाता नहीं, तो, बिना किसी मतलब के अब कोई उसे बुलाता नहीं, बिना किसी मतलब के वो आवाज़ लगाता नहीं, बिना किसी मतलब के

हों विसंगतियाँ कितनी

हों विसंगतियाँ कितनी kavita

ऋतुओं के थपेड़े सर्दियों की सिहरन सिहर जायेगी हमारे रिश्ते की रूहानी गर्माहट निखर जायेगी क्या हुआ रहने को बसर नहीं दिल हमारे तो घर हैं इक दूजे को संभाले बसेरे की ललक बिसर जायेगी अश्क आँखों मेँ झलके बताते

शिव की काशी

शिव की काशी kavita

धवल चन्द्र के भांति धवल सुरसरि के अमि साहिल पे बसा, घाटों के नुपुर से सज्जित श्रीविश्वनाथ के रंग रचा, आरोहित हो रवि-चन्द्र जहाँ लजियाते रश्मि-ओट तले, निरखि काशि-आभामंडल “ऐसी देदीप्य भू कहाँ मिले?” जहाँ रेणु रेणु में स्वर्ग है

चिड़िया सावन वाली

चिड़िया सावन वाली kavita

एक चिड़िया सावन वाली थी वो अलबेली अटखेली सी, बूझो न कोई पहेली सी बोले जो बड़ी सयानी थी, परियों की कोई कहानी थी वो रंगों की परिभाषा थी, वो सपनों की एक आशा थी वो गोरी थी न काली,

माँडना है तो मंडन है

माँडना है तो मंडन है kavita

माँडना मंडन है गेरू गोबर से लिपी पुती सुनिश्चित ज़मीन पर कली से उतरा हुआ एक जाज्वल्यमान नक्षत्र है माँडना ही तो मंडन है रेखाओं का सुव्यवस्थित तथा सुरक्षित निश्चित संस्कारों में बंधा हुआ एक बंधन है माँडना तो मंडन

अगले जनम में

अगले जनम में kavita

अगले जनम में तुम बन जाना ख़ुशी मैं बनूँगी दुःख तब हर एक होंठ पर लाल फूल सा खिल जाना तुम मैं भी बहूँगी हर एक आँख से झरने सी अगले जनम में तुम बन जाना मिसरी मैं बनूँगी नमक

एक टूटी हुई खिड़की

एक टूटी हुई खिड़की azad nazm

एक टूटी हुई खिड़की और धूप की सलवटों में छिपी एक परछाई ढूंढती हुई भीड़ में किसी अपने को एक ख़ामोश तड़प उसे देख लेने की जो कुछ न होते हुए भी था सब कुछ वो निगाह जो मुझे तुममें

सैनिक संकल्प

सैनिक संकल्प kavita

हर पत्थर पर शौर्य कहानी लिखी होती सरहद पर देश प्राण हैं देश ही पानी देश ही रोटी सरहद पर, पीछे कदम न रखने की आदत है खोटी सरहद पर सियाचिन के जैसी भी जीती हैं चोटी सरहद पर… जो