मुझे घिन्न आती है !

मुझे घिन्न आती है ! kavita

Photo by Sand Paper

मुझे घिन्न आती है,
घिन्न आती है उन लड़कियों से
जिनके चेहरों पर तेज़ाब से हमला हुआ है,
कुरूप होती हैं ये लडकियाँ
मैं कितने आराम से अपने घर के बिस्तर पर बैठा
लिख रहा होता हूँ प्रेम संवाद,
और इस बीच इनमें से किसी एक की तस्वीर
मुझे परेशान कर जाती है,
मैं सोचता हूँ कि ये ज़िन्दा क्यूँ है?
सोचता हूँ जो हर सुबह उठकर
इनमें से किसी एक का चेहरा देखना पड़े,
तो दिन कितना हतोत्साहित, कितना बुरा होगा
कभी कभी मैं ये सोचता हूँ
कि गर मेरी प्रेयसी पर, किसी ने तेज़ाब से हमला किया
तो उसकी कुरूपता से मैं कैसे पल्ला छुड़ाऊँगा?
क्या गले हुए, जले हुए किसी चेहरे के साथ
मैं ज़िन्दगी बिता पाऊँगा ?

मुझे घिन्न आती है उन लड़कियों से
जिनके चेहरों पर तेज़ाब से हमला हुआ है,
इनकी हिम्मत तो देखिये ज़रा
इन तस्वीरों में, इनका चेहरा तक नहीं ढका होता
मानो नुमाईश करती हों अपने इस नए चेहरे की,

मुझे घिन्न आती है उन लड़कियों से
जिनके चेहरों पर तेज़ाब से हमला हुआ है,
मैं सोचता हूँ क्या ऐसी किसी लड़की से
मैं कभी प्रेम संवाद तक कर पाऊँगा?
क्या कभी कोई कविता भी इनसे निकल पाएगी?
फिर इन्हें कोसता, घृणा से भवें सिकोड़ता मैं सो जाता हूँ,
सपने में मैं खुद को
किसी सुनसान सड़क के किनारे पाता हूँ,
और मोटरबाइक पर दो लड़के
मेरे चेहरे पर तेज़ाब छिड़क कर भाग जाते हैं,
मैं उन चेहरों को जानता तक नहीं हूँ
मेरा चेहरा गल जाता है, सड़ जाता है
किसी सस्ते अस्पताल में मुझे बचा लिया जाता है,
और अब मैं किसी आईने के सामने
खड़ा हूँ पर खुद को देख नहीं सकता,

अब मैं फिर से,
उन लड़कियों के बारे में सोचता हूँ
जिनके चेहरों पर तेज़ाब से हमला हुआ है
कहाँ से लाती हैं ये इतनी हिम्मत?
सौन्दर्य मात्र को समझते इस समाज में,
कैसे चल लेती हैं, बिना ढके वो चेहरा?
कैसे किसी आम कॉलेज में जाकर
बाकियों के बीच बैठकर पढ़ लेती हैं,
कहीं नौकरी कर लेती हैं?
कैसे अपने मौन से,
हर उस नज़र को जवाब दे देती हैं
जो कभी करुणा में, कभी घृणा में इनपर उठती हो,
कैसे हँस कर बातें कर लेती हैं अपनी सखियों से
जिनके चेहरों की चमड़ी
प्रसाधनों से लिपि है पुती है,
और जिनसे इनके लिए सहानुभूति का
या कड़वाहट का पसीना निकलता है,
और फिर आखिर में मैं सोचता हूँ उसके बारे में
जो इनमें से किसी एक लड़की से
पारस्परिक प्रेम कर बैठता है,
जिस समाज ने उस चेहरे को गलाया है, सड़ाया है
उसी समाज की छाती पर पाँव रख
उसी के बनाये मंडप में दोनों
चेहरे पर इतिहास की सबसे ख़ूबसूरत मुस्कुराहट लिए,
कैसे भाग्य, धारणाओं और
मनुष्य की तुच्छता को उसकी सरहदें बता
रच लेते हैं ब्याह,
मैं सोचता हूँ कि क्या इन दोनों से बढ़कर,
जो इन्होंने लिखा, उससे बढ़कर
कभी कोई कहानी,
कोई कविता भी,
क्या लिख पाऊँगा मैं?

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1 Comment on "मुझे घिन्न आती है !"

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Dr. K.S. Bhardwaj
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प्रारम्भ में आप पर गुस्सा आ रहा था
मगर खत्म होते होते आपने पानी छिड़क दिया
स्वानुभूति की ओर बढ़ते कदमों ने
गुस्सा हमारा आपने शांत कर दिया।
कविता अच्छी है। शुभाशीर्वाद।

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